शनिवार, 12 सितंबर 2020

विष्णु पुराण द्वितीय अध्याय

दूसरा अध्याय 

चौबीस तत्वोंके विचारके साथ जगतके उत्पत्ति क्रमका वर्णन और विष्णुको महिमा

श्रीपराशर उवाच 
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । 
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ १ 
नमो हिरण्यगर्भाय हरये शङ्कराय च । 
वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिणे ॥ २

श्रीपराशरजी बोले - जो ब्रह्मा , विष्णु और शंकररूपसे जगत् की उत्पत्ति , स्थिति और संहारके कारण है तथा अपने भक्तोंको संसार - सागरले तारने वाले हैं , उन विकाररहित , शुद्ध , अविनाशी , परमात्मा , सर्वदा एकरस , सर्वविजयी भगवान् बासुदेव विष्णुको नमस्कार है ॥ १.२ ॥

एकानेकस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः । अव्यक्तव्यक्तरूपाय विष्णवे मुक्तिहेतवे ॥ ३

 जो एक होकर भी नाना रूपवाले हैं . स्थूल सूक्ष्ममय हैं , अव्यक्त ( कारण ) एवं व्यक्त ( कार्य ) रूप है तथा [ अपने अनन्य भक्तोंकी मुक्ति के कारण है , [ उन श्रीविष्णुभगवान् को नमस्कार है ] ॥३ ॥

 सर्गस्थितिविनाशानां जगतो यो जगन्मयः । 
मूलभूतो नमस्तस्मै विष्णवे परमात्मने ॥ ४ 

 जो विश्वरूप प्रभु विश्वकी उत्पत्ति , स्थिति और संहारके मूल कारण है , उन परमात्मा विष्णुभगवान् को नमस्कार है ।॥ ४ ॥

आधारभूतं विश्वस्याप्यणीयांसमणीयसाम् । 
प्रणम्य सर्वभूतस्थमच्युतं पुरुषोत्तमम् ॥ ५ ज्ञानस्वरूपमत्यन्तनिर्मलं परमार्थतः । 
तमेवार्थस्वरूपेण भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥ ६ 
विष्णुं प्रसिष्णुं विश्वस्य स्थितौ सर्गे तथा प्रभुम् । 
प्रणम्य जगतामीशमजमक्षयमव्ययम् ॥ ७ 
कथयामि यथापूर्व दक्षायैर्मुनिसत्तमैः । 
पृष्टः प्रोवाच भगवानब्जयोनिः पितामहः ।। ८

जो विश्वके अधिष्ठान हैं , अतिसूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, सर्व प्राणियोंमें स्थित पुरुषोत्तम और अविनाशी है , जो परमार्थतः ( वास्तवमें ) अति निर्मल ज्ञानस्वरूप है , किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थरूपसे प्रतीत होते हैं , तथा जो [ कालस्वरूपसे ] जगत्की उत्पत्ति और स्थितिमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं , उन जगदीश्वर , अजन्मा , अक्षय और अव्यय भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तुम्हें वह सारा प्रसंग क्रमशः सुनाता हूँ जो दक्ष आदि मुनि श्रेष्ठोके पूछनेपर पितामह भगवान् ब्रह्माजीने उनसे कहा था।।५-८ ॥

तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदातटे । 
सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च ॥ ९ 

  वह प्रसंग दक्ष आदि मुनियोंने नर्मदा - तटपर राजा पुरुकुत्सको सुनाया था तथा पुरुकुत्सने सारस्वतसे और सारस्वतने मुझसे कहा था॥९॥

परः पराणां परमः परमात्मात्मसंस्थितः । रूपवर्णादिनिर्देशविशेषणविवर्जितः ॥ १० अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामर्धिजन्मभिः । 
वर्जितः शक्यते वक्तुं यः सदास्तीति केवलम् ॥ ११ 
सर्वत्रासो समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः । 
ततः स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥१२ 
तद्ब्रह्म परमं नित्यमजमक्षयमव्ययम् । 
एकस्वरूपं तु सदा हेयाभावाच्च निर्मलम् ॥ १३ 

जो पर ( प्रकृति ) से भी पर , परमश्रेष्ठ , अन्तरात्मामें स्थित परमात्मा , रूप , वर्ण , नाम और विशेषण आदिसे रहित है । जिसमें जन्म , वृद्धि . परिणाम , क्षय और नाश इन छः विकारोका सर्वथा अभाव है ; जिसको सर्वदा केवल है ' इतना ही कह सकते हैं , तथा जिनके लिये यह प्रसिद्ध है कि वे सर्वत्र है और उनमें समस्त विश्व बसा हुआ है - इसलिये ही विद्वान जिसको वासुदेव कहते हैं वही नित्य , अजन्मा , अक्षय , अव्यय , एकरस और हेय गुणोंके अभावके कारण निर्मल परब्रह्म है।।१०-१३ ॥

तदेव सर्वमेवैतद्व्यक्ताव्यक्तस्वरूपवत् । 
तथा पुरुषरूपेण कालरूपेण च स्थितम् ॥ १४ 

 वही इन सब व्यक्त ( कार्य ) और अव्यक्त ( कारण ) जगतके रूपसे , तथा इसके साक्षी पुरुष और महाकारण कालके रूपसे स्थित है ॥ १४ ॥

परस्य ब्रह्मणो रूपं पुरुषः प्रथमं द्विज । 
व्यक्ताव्यक्ते तथैवान्ये रूपे कालस्तथा परम् ॥ १५

 हे द्विज ! परब्रह्मका प्रथम रुप पुरुष है , अव्यक्त ( प्रकृति ) और व्यक्त ( महदादि ) उसके अन्य रूप हैं तथा [ सबको क्षोभित करनेवाला होनेसे ] काल उसका परमरूप है।॥१५ ॥

 प्रधानपुरुषव्यक्तकालानां परमं हि यत् । 
पश्यन्ति सूरयः शुद्धं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१६

 इस प्रकार जो प्रधान , पुरुष , व्यक्त और काल इन नारोंसे परे है तथा जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं वही भगवान् विष्णुक परमपद है ।। १६ ।

 प्रधानपुरुषव्यक्तकालास्तु प्रविभागशः । 
रूपाणि स्थितिसर्गान्तव्यक्तिसद्भावहेतवः ॥ १७ 

प्रधान , पुरुष , व्यक्त और काल- [ भगवान् विष्णुके ] रूप पृथक् - पृथक् संसारकी उत्पत्ति , पालन और संहारके प्रकाश तथा उत्पादन में कारण है ॥ १७ ॥

व्यक्तं विष्णुस्तथाव्यक्तं पुरुषः काल एव च । 
क्रीडतो बालकस्येव चेष्टा तस्य निशामय ॥ १८ 

भगवान् विष्णु जो व्यक्त , अव्यक्त , पुरुष और कालरूपसे स्थित होते हैं , इसे उनकी बालवत क्रीडा ही समझो ॥१८ ॥

अव्यक्त कारणं यत्तत्प्रधानमृषिसत्तमैः । 
प्रोच्यते प्रकृतिः सूक्ष्मा नित्यं सदसदात्मकम् ॥ १ ९

   उनमेंसे अव्यक्त कारणको , जो सदसद्रूप ( कारण शक्तिविशिष्ट ) और नित्य ( सदा एकरस ) है , श्रेष्ठ मुनिजन प्रधान तथा सूक्ष्म प्रकृति कहते हैं ।। १ ९ ॥

अक्षव्यं नान्यदाधारममेयमजरं ध्रुवम् । 
शब्दस्पर्शविहीन तद्रूपादिभिरसंहितम् ।। २० 

वह क्षयरहित है , उसका कोई अन्य आधार भी नहीं है तथा अप्रमेय , अजर , निश्चल शब्द - स्पर्शादिशून्य और रूपादिरहित है ॥२० ॥

त्रिगुणं तज्रगद्योनिरनादिप्रभवाप्ययम् । 
तेनाग्ने सर्वमेवासीद्ववाप्तं वै प्रलयादनु ॥ २१ 

  वह त्रिगुणमय और जगतका कारण है तथा स्वयं अनादि एवं उत्पत्ति और लयसे रहित है । यह सम्पूर्ण प्रपञ्च प्रलयकालसे लेकर सृष्टिके आदितक उसीसे व्याप्त था ॥ २१ ॥

वेदवादविदो विद्वन्नियता ब्रह्मवादिनः । 
पठति चैतमेवार्थ प्रधानप्रतिपादकम् ॥ २२ 

 हे विद्वन् ! श्रुतिके मर्मको जाननेवाले . श्रुतिपरायण ब्रह्मवेत्ता महात्मागण इसी अर्थको लक्ष्य करके प्रधानके प्रतिपादक इस ( निम्नलिखित ) श्लोकको कहा करते हैं -॥२२ ॥

नाह्ये न रात्रिर्न नभो न भूमि- 
नासीत्तमोज्योतिरभूद्य नान्यत् । 
श्रोत्रादिबुद्ध्यानुपलभ्यमेकं 
प्राधानिकं ब्रह्म पुर्मास्तदासीत् ॥ २३ 

 ' उस समय ( प्रलयकालमें ) न दिन था , न रात्रि थी , ना आकाश था , न पृथिवी थी , न अन्धकार था , न प्रकाश था और न इनके अतिरिक्त कुछ और ही था । बस , श्रोत्रादि इन्द्रियों और बुद्धि आदिका अविषय एक प्रधान ब्रह्म और पुरुष ही था ' ॥२३ ॥

विष्णोः स्वरूपात्परतो हि ते द्वे 
रूपे प्रधानं पुरुषश्च विप्र । 
तस्यैव तेऽन्येन धृते वियुक्ते 
रूपान्तरं तद् द्विज कालसंज्ञम् ॥ २४

 हे विप्र ! विष्णुके परम ( उपाधिरहित ) स्वरूपसे प्रधान और पुरुष - ये दो रूप हुए ; उसी ( विष्णु ) के जिस अन्य रूपके द्वारा वे दोनों ( सृष्टि और प्रलयकालमें ] संयुक्त और वियुक्त होते हैं , उस रूपान्तरका ही नाम ' काल ' है ॥ २४ ॥

 प्रकृतौ संस्थितं व्यक्तमतीतप्रलये तु यत् । तस्मात्प्राकृतसंज्ञोऽयमुच्यते प्रतिसञ्चरः ॥ २५

 बीते हुए प्रलयकालमें यह व्यक्त प्रपञ्च प्रकृतिमें लीन था , इसलिये प्रपञ्चके इस प्रलयको प्राकृत प्रलय कहते है॥२५॥ 

 अनादिभंगवान्कालो नान्तोऽस्य द्विज विद्यते । अव्युच्छिन्नास्ततस्त्वेते सर्गस्थित्यत्तसंयमाः ॥ २६ 

हे द्विज ! कालरूप भगवान अनादि हैं , इनका अन्त नहीं है इसलिये संसारको उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय भी कभी नहीं रुकते [ वे प्रवातरूपसे निरन्तर होते रहते हैं ॥२६ ॥

गुणसाम्ये ततस्तस्मिन्पृथक्युसि व्यवस्थिते । 
कालस्वरूप तद्विष्णोमैत्रेय परिवर्तते ।। २७ 

 है मैत्रेय ! प्रलयकालमें प्रधान ( प्रकृति ) के साम्यावस्थामे स्थित हो जानेपर और पुरुपके प्रकृतिसे पृथक् स्थित हो जानेपर विष्णुभगवान् का कालरूप [ इन दोनोंको धारण करने के लिये प्रवृत्त होता है ॥२७ ॥

ततस्तु तत्परं ब्रहा परमात्मा जगन्मयः । 
सर्वगः सर्वभूतेश : सर्वात्मा परमेश्वरः ॥ २८ 
प्रधानपुरुषौ चापि  अविश्यात्मेछया हरिः । 
क्षोभयामास सम्प्राप्ते सर्गकाले व्ययाव्ययौ ॥ २ ९ 

तदनन्तर [ सर्गकाल उपस्थित होनेपर ] उन परब्रह परमात्मा विश्वरूप सर्वव्यापी सर्वभूतेश्वर सर्वात्मा परमेश्वरने अपनी इच्छासे विकारी प्रधान और अविकारी पुरुष प्रविष्ट होकर उनको क्षोभित किया ॥ २८-२९ ।।

यथा सन्निधिमात्रेण गन्धः क्षोभाय जायते । 
मनसो नोपकर्तृत्वात्तथाऽसौ परमेश्वरः ॥ ३० 

  जिस प्रकार क्रियाशील न होनेपर भी गन्ध अपनी सन्निधिमात्रसे ही मनको क्षुभित कर देता है उसी प्रकार परमेश्वर अपनी सन्निधिमात्रसे ही प्रधान और पुरुषको प्रेरित करते हैं ॥ ३० ॥ 

स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश्च पुरुषोत्तमः । ससङ्कोचविकासाभ्यांप्रधानत्येऽपि च स्थितः ॥ ३१

हे ब्रह्मन् ! वह पुरुषोत्तम ही इनको क्षोभित करनेवाले हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा संकोच ( साम्य ) और विकास ( क्षोभ ) युक्त प्रधानरूपसे भी ये ही स्थित है ॥३१ ॥

 विकासाणुस्वरूपैश्च ब्रह्मरूपादिभिस्तथा । 
व्यक्तस्वरूपश्च तथा विष्णुः सर्वेश्चरेश्वरः ।। ३२

 क्रमादि समस्त ईश्वरोंके ईश्वर के विष्णु ही समष्टि - व्यष्टिरूप , ब्रह्मादि जीवरूप तथा महत्तत्त्वरूपसे स्थित हैं ॥ ३२ 

गुणसाम्यात्ततस्वस्मारक्षेत्रज्ञाधिष्ठितान्मुने । गुणव्यञ्जनसम्भूतिः सर्गकाले द्विजोत्तम ॥ ३३

 हे द्विजश्रेष्ठ ! सर्गकालके प्राप्त होनेपर गुणोंको साम्यावस्थारूप प्रधान जय विष्णुके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुआ तो उससे महतत्त्व की उत्पत्ति हुई ॥ ३३

 प्रधानतत्त्वमुद्भूतं महान्तं तत्समावृणोत् ।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान् ॥ ३४ 
प्रधानतत्त्वेन समं त्वचा बीजमिवावृतम् । 
वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः ॥ ३५ त्रिविधोऽयमहङ्कारो महत्तत्वादजायत । 
भूतेन्द्रियाणां हेतुस्स त्रिगुणत्वान्महामुने । 
यथा प्रधानेन महान्महता स तथावृतः ॥ ३६ 

 उत्पन्न हुए महान् को प्रधानतत्व ने आवृत किया ; महत्तत्त्व सात्विक , राजस और तामस , भेदसे तीन प्रकारका है । किन्तु जिस प्रकार बीज छिलके से समभावसे ढंका रहता है वैसे ही यह त्रिविध महत्तत्व प्रधान - तत्वसे सब ओर व्याप्त है । फिर त्रिविध महत्तत्त्वसे ही वैकारिक ( सात्त्विक ) तेजस ( राजस ) और तामस भूतादि तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ । हे महामुने ! यह त्रिगुणात्मक होनेसे भूत और इन्द्रिय आदिका कारण है और प्रधानसे जैसे महतत्व व्याप्य है , वैसे ही महतत्वसे वह ( अहंकार ) व्याप्त है । ३४-३६

भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः । 
ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम् ॥ ३७ 

भूतादि नामक तामस अहंकारने विकृत होकर शब्द - तन्मात्रा और उससे शब्द - गुणवाले आकाशको रचना की ॥ ३७ ।।

शब्दयात्रं तथाकाशं भूतादिः ससमावृणोत् । 
आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ॥ ३८

उस भूतादि तामस अहंकार ने शब्द - तन्मात्रारूप आकाशको व्याप्त किया । फिर [ राद्ध - तन्मात्रारूप ] आकाशने विकृत होकर स्पर्श - तन्मात्राको रचा ॥३८ ॥

बलवानभ्रवद्वायुस्तस्य स्पशों गुणो मतः । 
आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत् ॥ ३ ९ 

उस ( स्पर्श - तन्मात्रा ) से बलवान् वायु हुआ.उसका गुण स्पर्श माना गया है । शब्द तन्मात्रारूप आकाशने स्पर्श - तमात्रावाले वायुको आवृत किया है ॥३ ९ ॥

ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्र ससर्ज ह। 
ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ ४० 

फिर ( स्पर्श - तन्मात्रारूप ] वायुने विकृत होकर रूप - तन्मात्राकी सृष्टि की । ( रूप - तन्मात्रायुक्त ) वायुसे तेज उत्पन्न हुआ हैं , उसका गुण रूप कहा जाता है ॥ ४०॥ 

स्पर्शमात्रं तु वै वायू रूपपात्रं समावृणोत् । 
ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमा ससर्ज ह ॥ ४१ 

 स्पर्श - तन्मात्रारूप वायुने रूप - तन्मात्रायाले तेजको आवृत किया । फिर ( रूप - तन्मात्रामय ] तेजने भी विकृत होकर रस - तन्मात्राकी रचना की ।। ४१ ॥

सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि च । 
रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्र समावृणोत् ।। ४२

 उस ( रस तन्मात्रारूप ) से रस - गुणवाला जल हुआ । रस - तन्मात्रावाले जलको रूप - तन्मात्रामय तेजने आवृत किया ॥ ४२ ॥

 विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससजिरे । 
सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः ।। ४३

 [ रस तन्मात्रारूप ) जलने विकारको प्राप्त होकर गन्ध - तन्मात्राकी सृष्टि की , उससे पृथिवी उत्पन्न हुई है जिसका गुण गन्ध माना जाता है । ४३ ॥

 तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता ॥ ४४

 उन - उन आकाशादि भूतोंने तन्मात्रा है [ अर्थात् केवल उनके गुण शब्दादि ही हैं ] इसलिये वे तन्मात्रा ( गुणरूप ) ही कहे गये है ॥४४ ॥

 तन्मात्राण्यविशेषाणि अविशेषास्ततो हि ते ॥ ४५ 

तन्मात्राओ में विशेष भाव नहीं है इसलिये उनकी अविशेष संज्ञा है ।॥ ४५ ॥

न शान्ता नापि घोरास्ते न मूढाश्चाविशेषिणः । भूततन्मात्रसर्गोऽयमहङ्कारात्तु तामसात् ॥ ४६

  वे अविशेष तन्मात्राएँ शान्त , घोर अथवा मूढ़ नहीं है [ अर्थात् उनका सुख - दुःख या मोहरूपसे अनुभव नहीं हो सकता ] इस प्रकार तामस अहंकारसे यह भूत तन्मात्रारूप सर्गः हुआ ॥४६ ॥

 तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश । 
एकादशं मनश्चात्र देवा वैकारिकाः स्मृताः ॥ ४७

दस इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारसे और उनके अधिष्ठाता देवता वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए कहे जाते हैं । इस प्रकार इन्द्रियोंके अधिष्ठाता दस देवता और ग्यारहवाँ मन वैकारिक ( सात्विक ) हैं।।४७ ॥

त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमत्र च पञ्चमम् । शब्दादीनामवाप्त्यर्थ बुद्धियुक्तानि वै द्विज ।। ४८ 

 हे द्विज ! त्वक् , चक्षु , नासिका , जिला और श्रोत्र - ये पाँचों बुद्धिकी सहायतासे शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है ॥४८ ॥

पायूपस्थौ करौ पादौ वाक् च मैत्रेय पञ्चमी । विसर्गशिल्पगत्युक्ति कर्म तेषां च कथ्यते ॥ ४ ९

 हे मैत्रेय ! पायु ( गुदा ) , उपस्थ ( लिङ्ग ) , हस्त , पाद और वाक् - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । इनके कर्म [ मल - मूत्रका ] त्याग , शिल्प , गति और वचन बतलाये जाते हैं ॥४ ९ ॥

आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा । शब्दादिभिर्गुणैर्ब्रह्मन्संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५०

आकाश , वायु , तेज , जल और पृथिवी - ये पांचों भूत उत्तरोत्तर ( क्रमशः ) शब्द - स्पर्श आदि पाँच गुणोंसे युक्त हैं ॥ ५० ॥

 शान्ताघोराश्चमूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ॥ ५१ 

 ये पाँचों भूत शान्त घोर और मूढ हैं [ अर्थात् सुख , दुःख और मोहयुक्त है । अतः ये विशेष कहलाते हैं ||५१||

नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहति विना । 
नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्रशः ॥ ५२

 इन भूतोंमें पृथक् - पृथक् नाना शक्तियाँ हैं । अतः वे परस्पर पूर्णतया मिले बिना संसारकी रचना नहीं कर सके ।। ५२ ।।

 समेत्यान्योन्यसंयोग परस्परसमाश्रयाः । 
एकसङ्घातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५३ पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च । 
महदाद्या विशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति ते ।। ५४ 

इसलिये एक दूसरेके आश्रय रहनेवाले और एक ही संघातकी उत्पत्तिके लक्ष्यवाले महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त प्रकृति के इन सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रधान तत्त्वके अनुग्रहसे अण्ड की उत्पत्ति की ॥५३-५४ ॥


तत्क्रमेण विवृद्धं सज्जलबुद्बुदवत्समम् । 
भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे महत्तदुदकेशयम् । 
प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ।। ५५

  हे महायुद्ध ! जलके खुलपुलेके समान क्रमशः भूतोंसे बढ़ा हुआ वह गोलाकार और जलपर स्थित महान् अण्ड ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) रूप विष्णुका अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ ॥ ५५॥

 तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ व्यक्तरूपो जगत्पतिः । विष्णुब्रह्मस्वरूपेण स्वयमेव व्यवस्थितः ।। ५६

 उसमें वे अव्यक्त - स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भरूपसे स्वयंही विराजमान हुए ॥५६॥

 मेरुरूल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः । 
गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन्सुमहात्मनः ॥ ५७

उन महात्मा हिरण्यगर्भका सुमेरु उल्ब ( गर्भको ढ़ाकनेवाली झिल्ली ) , अन्य पर्वत , जरायु ( गर्भाशय ) तथा समुद्र गर्भाशयस्थ रस था ।५७ ॥

 साद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः । तस्मिन्नण्डेऽभवद्विप्र सदेवासुरमानुषः ॥ ५८

 हे विप्र ! उस अण्डमें ही पर्वत और द्वीपादिके सहित समुद्र मह - गणके सहित सम्पूर्ण लोक तथा देव , असुर और मनुष्य आदि विविध प्राणिवर्ग प्रकट हुए । ५८ ॥

 वारिवहन्यनिलाकाशैस्ततो भूतादिना बहिः । 
वृतं दशगुणैरण्डं भूतादिर्महता तथा ।। ५ ९ 

 वह अण्ड पूर्व - पूर्वकी अपेक्षा दस - दस - गुण अधिक जल , अग्नि , वायु , आवश और भूतादि अर्थात् तामस - अहंकारसे आवृत है तथा भूतादि महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है ।। ५९ ।।

अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मस्तैः सर्वैः सहितो महान् । 
एभिरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् । नारिकेलफलस्यान्तर्बीज बाह्यदलैरिव ॥६० 

और इन सबके सहित वह महत्तत्त्व भो अव्यक्त प्रधानसे आवृत है । इस प्रकार जैसे नारियलके फलका भीतरी बीज बाहरसे कितने ही छिलकोंसे ढ़ंका रहता है वैसे ही यह अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे घिरा हुआ है ।६० ॥

जुषन् रजो गुणं तत्र स्वयं विश्वेश्वरो हरिः । 
ब्रह्मा भूत्वास्य जगतो विसृष्टौ सम्प्रवर्तते ॥ ६१

  उसमें स्थित हुए स्वयं विश्वेश्वर भगवान् विष्णु ब्रह्मा होकर रजोगुणका आश्रय लेकर इस संसारकी रचनामे प्रवृत्त होते हैं ।६१ ॥

सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना । सत्त्वभृद्भगवान्विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥६२ 

तथा रचना हो जानेपर सत्वगुण - विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान् विष्णु उसका कल्पान्तपर्यन्त युग - युगमे पालन करते हैं । ६२ ।

तमोद्रेकी च कल्पान्ते रूबरूपी जनार्दनः । 
मैत्रेयाखिलभूतानि भक्षयत्यतिदारुणः ॥ ६३ 

  हे मैत्रेय ! फिर कल्पका अन्त होनेपर अति दारुण तमः प्रधान रुद्ररूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतोका भक्षण कर लेते है ॥६३ ॥

भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येकार्णवीकृते । 
नागपर्सङकशयने शेते च परमेश्वरः ॥ ६४ 

 इस प्रकार समस्त भूतोंका भक्षण कर संसारको जलमय करके वे परमेश्वर शेष - शय्यापर शयन करते हैं ॥६४ ॥

प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टिं करोति ब्रह्मरूपधृक् ।। ६५

जगनेपर ब्रह्मारूप होकर वे फिर जगत्की रचना करते हैं ॥६५॥

 सृष्टिस्थित्यन्तकरणी ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् । 
स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ ६६ 

 वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत्की सृष्टि , स्थिति और संहारके लिये ब्रह्मा , विष्णु और शिव - इन तीन संज्ञाओंको धारण करते हैं ।। ६६ ।।

स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यंचपातिच । 
उपसंहियते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः ॥ ६७ 

 वे प्रभु विष्णु स्रष्टा ( ब्रह्मा ) होकर अपनी ही सृष्टि करते हैं , पालक विष्णु होकर पाल्यरूप अपना ही पालन करते हैं और अन्तमें स्वयं ही संहारक ( शिव ) तथा स्वयं ही उपसंहृत ( लीन ) होते हैं ।६७ ॥

पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च । 
सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषारख्यं हि यज्जगत् ॥ ६८ 
स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोऽव्ययः । 
सर्गादिकं तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम् ।। ६ ९ 

पृथिवी , जल , तेज , वायु और आकाश तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि जितना जगत् है सब पुरुषरूप है और क्योंकि वह अव्यय विष्णु ही विश्वरूप और सब भूतोंके अन्तरात्मा है , इसलिये ब्रह्मादि प्राणियों में स्थित सर्गादिक भी उन्हीं के उपकारक है । [ अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजों द्वारा किया हुआ हवन यजमानका उपकारक होता है , उसी तरह परमात्माके रचे हुए समस्त प्राणियोंद्वारा होनेवाली सृष्टि भी उन्हीं की उपकारक है ] || ६८-६९ ।

स एव सृज्यः सच सर्गकर्ता 
स एव पात्यत्ति च पाल्यते च ।। 
ब्रह्माद्यवस्थाभिरशेषमूर्ति 
विष्णुर्वरिष्ठो वरदो वरेण्यः ।। ७०

  वे सर्वस्वरूप , श्रेष्ठ , वरदायक और वरेण्य ( प्रार्थनाके योग्य ) भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा आदि अवस्थाद्वारा रचनेवाले है , वे ही रचे जाते हैं , वे ही पालते हैं , वे ही पालित होते हैं तथा वे ही संहार करते है [ और स्वयं ही संहृत होते हैं ] ७० ।।

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