(प्रात: - संध्याके अनुसार करे)
प्राणमयके बाद 'ऊँ सूर्यश्च मेति' के विनियोग और आचमन - मन्त्रके स्थानपर नीचे लिखे विनियोग और मन्त्र पढ़े।
विनियोग -
ऊँ आपः पुनन्त्विति ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शेन विनियोगः।
आचमन -
ॐ आप: पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्। पुन्नतु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपुता पुनातु माम्। यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम |
सर्व पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहँ स्वाहा।
(तै आ ० प्र ० १०, अ ० २३३)
उपस्थान -
चित्रके अनुसार दोनों हाथ ऊपर करे।
अर्घ्य -
सीधे खड़े होकर सूर्यको एक अर्घ्य दे।
विष्णुरूपा गायत्रीका ध्यान
ॐ मध्याह्ने विष्णुरूपां च तार्क्ष्यस्थां पीतवाससाम्
युवतीं यजुर्वेदां सूर्यमण्डलसंस्थिताम् |
सौर मंडल में स्थित युवावस्था वाली पीला वस्त्र, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए गरीब पर बैठी हुई यजुर्वेदस्वरूपा गायत्री का ध्यान करें।
1 - शायं अग्निश्च में त्युक्त्वा प्रातः सूर्येत्यपः पिबेत् |आप: पुनन्तु मध्याह्ने ततश्चाचमनं चरेत् ||
(भारद्वाज, ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्यसंहिता)
शायं - संध्या
(प्रातः - संध्या के अनुसार करें)
उत्तराभिमुख हो सूर्य के रहते सबसे उत्तम है।
प्राणायाम के बाद 'ऊँ सूर्यश्च मेति०' के विनियोग तथा आचमन मंत्र के स्थान पर नीचे लिखा विनियोग और मंत्र का पढ़कर आचमन करें |
विनियोग - ॐ अग्निश्च मेति रुद्र ऋषिः प्रकृतिश्छंदोऽग्निर्देवता आपामुपस्पर्शने विनियोगः।
आचमन -
ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम् | यदह्रा पापमकार्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु। यत्किंच दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा।
(तै आ प १० २४ २४)
अर्घ्य -
पश्चिम की ओर मुख करके बैठे हुए तीन अर्घ दें। |
५ ९ २] नी ० कर्म पु ० ४]
उपस्थान
चित्र के अनुसार दोनों हाथ बंदकर से कमल के सदृश करें।
शिवरूपा गायत्री ध्यान
ॐ सायाह्ने शिवरूपां च वृद्धां वृषभवाहिनीम्। सूर्यमण्डलमध्यस्थां सामवेदसमायुताम् ||
सूर्य मंडल में स्थित वृद्धारूपा त्रिशूल, डमरू, पाश तथा पात्र लिए वृषभ पर बैठी हुई सामवेदस्वरूपा गायत्री का ध्यान करें।
आशौच में संध्योपासन विधि
महर्षि पुलस्त्य ने जननाशौच एवं मरणाशौच में संध्योपासन की अबाधित आवश्यकता बताई गई है। लेकिन अशौच में, प्रक्रिया भिन्न हो जाती है । शास्त्रों ने इसमें मानसी संध्याका विधान किया है। इसमें उपस्थान नही हो जाता है। यह संध्या की आरम्भ से, सूर्य के अर्घ्य तक ही सीमित रहती है। यहां गायत्री का दस बार जप करना आवश्यक है। इतने से संध्योपासन का फल प्राप्त होता है। एक मत यह है कि इसमें कुश और जलका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। निर्णीतमत यह है कि बिना मन्त्र पढ़े प्राणायाम करें। मार्जन मत्रों काे मन में ही पढ़कर मार्जन करें| गायत्री का सम्यक उच्चारण कर सूर्य को अर्घ्य दें। तथा पैठीनसि के अनुसार सूर्य को जलाञ्जलि देकर प्रदक्षिणा और नमस्कार करें। आत्पति के समय रास्ते में और यहां तक कि अशक्त होने पर मानसी संध्या भी की जाती है।
१ संध्यामिस्टं च होमं च यावज्जीवं समाचरेत्।
न त्यजेत् सूतके वापि त्यजन् गच्छत्यधोगतिम् ||
२ सूतके मानसीं संध्यां कुर्याद् वै सुप्रयत्नतः। (स्मृतिसमुच्चय)
३ - उपस्थानम न चैव हि। (भारद्वाज, आचार भूषण)
४ - अर्घ्यान्ता मानसी संध्या। (निर्णयसिंधु)
५- गायत्री दशधा जपत्वा संध्यायाः फलमाप्नुयात्।
(स्मृति समुच्चय)
६ कुशवारीे विवर्जिता। (निर्णयसिन्धु)
७ सुतके मृतके कुर्यात् प्राणायामममंत्रकम् तथा मार्जनमन्त्रस्तु मनसोच्चचार्य मार्जयेत्। गायत्री सम्यगुच्चार्य सूर्यायार्घ्य निवेदयेत्। मार्जनम् तु वा कार्यमुपस्थानम् न चैव हि। (भारद्वाज आचारभूषण १०३-१०४)
८ सूतके तु सावित्र्याञ्जलिं प्रक्षिप्य प्रदक्षिणम्|
कृत्वा सूर्य तथा ध्यायन् नमस्कुर्यात् पुनः-पुनः।
९- (क) अपान्नश्चाशुचिः काले तिष्ठन्नपि जपेद् दश। (आचारभूषण पृ। १०४)
(ख) आपद्यध्वन्यशक्तश्च संध्यां कुर्वीत मानसीम् |
(गौतम)

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