शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

संध्योपासन

 

गतांक से आगे

फिर प्राणायाम करें।  

प्राणायाम का विनियोग - 

प्राणायाम करनेके पूर्व उसका विनियोग इस प्रकार पढ़े 

१ - शास्त्रका कथन है कि पर्वतसे निकले धातुओका मल जैसे अग्निसे जल जाता है, उसी प्रकार प्राणायामसे आन्तरिक पाप जल जाते हैं 

यथा पर्वधातुनां दोषान् हरति पावकः।  

एवमन्तर्गतं पापं प्राणायामेन दह्यते 

(प्रयोगपारिजात, अत्रिस्मृ० २/३) 

प्राणायाम करनेवाला आग की तरह चमक उठता है 

प्राणायामैस्त्रिभिः पुतस्तत्क्षणाज्जलतेऽग्निवत् //

(प्रयोगपारिजात)

यही बात शब्द - भेदसे अत्रिस्मृति (३.३) में कही गयी है। भगवान्  ने कहा है कि प्राणायाम सिद्ध होने पर हजारों वर्षोकी लम्बी आयु प्राप्त होती है। अतः चलते फिरते सदा प्राणायाम किया करें 

गच्छंस्तिष्ठन् सदा कालं वायुस्वीकरणं परम्।  

सर्वकालप्रयोगेण सहस्रायुर्भवेन्नर: 

प्राणायाम की बड़ी महिमा कही गयी है। इससे पाप - ताप तो जल ही जाते हैं, शारीरिक उन्नति भी अद्भुत ढंगसे होती है। हजारों वर्षकी लंबी आयु भी इससे मिल सकती है। सुन्दरता और स्वास्थ्यके लिये तो यह मानो वरदान ही है। यदि प्राणायामके।  ये लाभ बुद्धिगम्य हो जायें तो इसके प्रति आकर्षण बढ़ जाय और तब इससे राष्ट्र का बड़ा लाभ हो। 

जब हम साँस लेते हैं, तब वहाँ मिले हुए आक्सीजनसे फेफड़ों में पहुँचा हुआ अशुद्ध काला रक्त शुद्ध होकर लाल बन जाता है। इस शुद्ध रक्त को हृदय पम्पिंग - क्रियाद्वारा  शरीरमें संचार कर देता है। यह रक्त शरीरके सभी घटकोंको खुराक बाँटता - बाँटता स्वयं काला पड़ जाता है। तब हृदय इस उपकारी तत्त्वको फिरसे शुद्ध होनेके लिये फेफड़ोमें भेजता है। वहाँ सांस में मिले प्राणवायु (आक्सीजन) के द्वारा यह फिर से सशक्त हो जाता है और फिर सभी घटकोंको खुराक बाँटने वाली शरीरकी जीवनी - शक्तिको बनाये रखता है।  यही कारण है कि सांसके बिना पाँच मिनट भी जीना कठिन हो जाता है किंतु रक्तको शोधन - क्रियामे एक बाधा पड़ती रहती है।  साधारण सांस फेफड़ों की सूक्ष्म कणिकाओतक पहुँच नहीं पाती। इसकी यह अनिवार्य आवश्यकता देख भगवान् ने प्रत्येक सत्कर्म के आरम्भ में इसका (प्राणायामका) सनिवेश कर दिया है।  कभी - कभी तो सोलह सोलह प्राणयामोका विधान कर दिया है 

‌‍ द्वौद्वौ प्राप्तस्तु मध्याह्ने त्रिभि संध्या सुरार्चने।  

भोजनादौ भोजनान्ते प्राणायामास्तु षोडश ।।

(देवीपुराण)

किंतु भगवान् की यह व्यवस्था तो शास्त्र मानकर चलनेवाले अधिकारी पुरूषों के लिये हुई, पर प्राणायाम सभी प्राणियोंके लिये अपेक्षित है।  अतः भगवान् ने प्राणायामकी दूसरी व्यवस्था प्रकृतिके द्वारा करवायी है।  हम जो खर्राटे भरते हैं, वह वस्तुतः प्रकृतिके द्वारा हमें बना दिया प्राणायाम ही है।  इस प्राणायामका नाम भस्त्रिका प्राणायाम 'है।  भस्त्रिका 'का अर्थ है - भाथी'।  भाथी इस गहराईसे वायु खींचती है कि जिससे उसके प्रत्येक अवयवतक वायु पहुंच जाती है और वह पूरी फूल उठती है और वह इस भाँति वायु फेंकती है कि उसका प्रत्येक अवयव भलीभांति सिकुड़ जाता है।  इसी तरह भस्त्रिका प्राणायाम में वायुको इस तरह खींचा जाता है कि फेफड़े के प्रत्येक कणिकातक वह पहुँच जाते हैं और छोड़ते समय प्रत्येक कणिकासे वह निकल जाते हैं।  इस प्राणायाम में 'कुम्भक' नहीं होता और न मन्त्रकी ही आवश्यकता पड़ती है।  केवल ध्यानमात्र करना चाहिए 

'अगर्भो ध्यानमात्रं तु स चामन्त्रः प्रकीर्तितः ।।  

(देवीपुराण ११ .२०.३४) 

स्वास्थ्य और सुन्दरता बढ़ानेके लिये और भगवान् के सानिध्यको प्राप्त करनेके लिये तो प्राणायाम शत - शत अनुभूत है।  भस्त्रिका - प्राणायामकी कई विधियाँ है।  उनमें से एक प्रयोग लिखा गया है प्रात: खाली पेट शवासनसे लेट जाय।  मेरुदण्ड सीधा होना चाहिए।  इसलिए चौकी या जमीन पर लेट जाना, फिर मुँह बंद कर नासे धीरे - धीरे साँस खींचना।  जब खींचना बंद हो जाय, तब मुखसे फुंकते हुए धीरे - धीरे छोडे, रोके नहीं।  भगवान् का ध्यान चलता है।  यह प्रयोग बीस मिनट से कम न हो।  यहाँ ध्यान देनेकी बात यह है कि साँस लेना और छोड़ना अत्यन्त धीरे - धीरे हो।  इतना धीरे - धीरे कि नाकके पास हाथ थामे हुए सत्तू भी उड़ न सके 

न प्राणेनाप्यपानेन वेगाद् वायु सुमुच्छ्वसेत्।  

येन सक्तुन करस्थांश्च निःश्वासो नैव चालयेत् ।।  

प्रणवस्य ऋषिर्ब्रह्मा गायत्री छंद एव च।  

देवोऽग्निः परमात्मा स्याद् योगो वै सर्वकर्मसु।  

(अग्निपु। २१५।३२)

ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।

ॐ सप्तव्याहृतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवशिष्ठकश्यपा  ऋषयो गायत्र्युष्णिगनुस्टुब्बृहती पङ्क्तित्रिष्टुब्जभृत्जुबज्यगत्यश्छन्दास्यनवाय्वादित्यबृहष्पतिवरुणेन्द्रविष्णवो देवता अनादिष्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः।  

ॐ तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता प्राणायामे विनियोगः।  

ॐ आपो ज्योतिरीति शिरस: प्रजापतिर्ऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्य देवता: प्रणायामे विनियोगः।  

(क) प्राणायामके मन्त्र - 

फिर आँखें बंद कर नीचे लिखित मन्त्रोंका प्रत्येक प्राणायाम तीन - तीन बार (या पहले एक बारसे ही आरम्भ करे, धीरे - धीरे तीन - तीन बारका अभ्यास बढ़ावे) पाठ करे।  

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः  ॐ सत्यम्।  ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।  

(तै आ तै प्र ० १० अ ० २०): 

व्याहृतिनां तु सर्वासामृषिरेव प्रजापतिः।  

व्यस्ताश्चैव समस्ताश्च ब्राह्मक्षरमोमिति ।।  

विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः।  

ऋषिरत्रिविसिष्ठश्च कश्यपश्च यथाक्रमम् 

अग्निर्वायु रविश्चैव वाक्पतिर्वरुणस्तथा।  

इन्द्रो विष्णुर्व्याहृतिनां दैवतानि यथाक्रमम् ।।  

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्  च बृहतीपंक्तिरेव च।  

त्रिष्टुप् च जगति चेतिच्छन्दांस्याुहुरनुक्रमात् ।।  

(अग्निपुराण २१५। २३५-३ १) 

१ - 'आपो ज्योती रस' इति गायत्र्यास्तु शिरः स्मृतम्।  ऋषि: प्रजापतिस्तस्य छन्दोहीनं यजुर्यतः ।।  ब्रह्माग्निवायुसूर्याश्च देवताः परिकीर्तिताः   ।। 

(अग्निपुराण २१५१४४-४५)

प्राणायाम की विधि



प्राणायाम के तीन भेद होते हैं १ पूरक, २ कुम्भक और ३ रेचक। 

१ - अँगूठे से नाकके दाहिने छिद्र को दबाकर बायें छिद्र से श्वासको धीरे - धीरे खींचने को पूरक प्राणायाम ’कहते हैं।  मूल्य निर्धारण प्राणायाम करते समय उपर्युक्त मन्त्रोंका मनसे उच्चारण करते हुए नाभिदेशमें नीलकमलके दलके समान नीलवर्ण चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं।  2 - जब सांस खींचना पड़ जाए, तब अनामिका और कनिष्ठिका अंगुलीसे नाकके छिद्रों को भी दबा दें।  मन्त्र जपता रहा।  यह कुम्भक प्राणायाम ’हुआ।  इस अवसरपर हृदयमें कमलपर विराजमान लाल वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माका ध्यान करते हैं।

३ - अँगूठे को हटाकर दाहिने छिद्र से श्वासको धीरे - धीरे छोड़नेको रेचक प्राणायाम 'कहते हैं।  इस समय ललाट में श्वेतवर्ण शंकरका ध्यान करना चाहिए।  मनसे मन्त्र जपते रहें। 

(ग) प्राणायाम के बाद आचमन- 

प्रातःकालका विनियोग और मन्त्र

प्रातःकाल नीचे लिखित विनियोग पढ़कर पृथ्वीपर जल छोड़ दे - 

पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रको पढ़कर आचमन करे 

सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्।  यद्रत्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु।  यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ।। (तै आ ० प्र ० १०, अ ० २५) 

मार्जन - 

इसके बाद मार्जनका निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बायें हाथमे जल के बारे में कुशोंसे या दाहिने हाथकी तीन अँगुलियोंसे १ से ७ तक तक नानत्रोंको बोलकर सिरपर जल जमा हो जाता है।  ८ वें मन्त्रसे पृथ्वी पर और ९वें से फिर सिरपर जल छिड़कें । 

विप्रुषोऽष्टौ क्षिपेन्मूर्ध्नि अथो सस्य क्षयाय च।  (व्यासस्मृति)

ॐ आपो  हि ष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्द: आपो देवता मार्जने विनियोग: 

३ - 'आपो हि ष्ठे' त्यूचोऽस्याश्च सिन्धुद्वीप ऋषिः स्मृतः  ब्रह्मस्नानाय छन्दोऽस्य गायत्री देवता जलम्।  

मार्जने विनियोगोऽस्य ह्यावभृथ के क्रतोः 

(अग्निपु ० २१५.४१-४२) 

(योगियाज्ञवल्क्यस्मृति भी भी इसका प्रमाण मिलता है)

१ ऊँ आपो हि ष्ठा मायोभुवः।  

२  ऊँ ता न उर्जे दधातन।  

३  ऊँ महे रणया चक्षसे।  

४  ॐ यो वाः शिवतमो रसः।  

५  ॐ तस्य भाजयतेह नः।  

६  ॐ उशतीरिव मातरः।  

७  ॐ तस्मा अरं गमाम वः।  

८  ॐ यस्य क्षायय जिन्वथ  

९  ॐ आपो जनयथा च नः।  

(यजु ० ११। ५०-५२) 

मस्तक पर जल छिड़कने के विनियोग और मंत्र 

निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बाएं हाथ में जल लेकर  दाहिने हाथ से ढँक दें और निम्नलिखित मंत्र पढ़कर सिर पर छिड़कें।  

विनियोग

द्रुपदादिवेतस्य कोकिलो राजपूत्र ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवताः शिरस्सेके विनियोगः।  

१ - कोकिलो राजपुत्रस्तु द्रुपदाया ऋषिः स्मृतः।  

अनुष्टुप् च भवेच्छन्द आपश्चैव तु दैवतम् ।।  

(योगी याज्ञवल्क्य, अाह्निक सूत्रावली)  

मंत्र -  ॐ द्रुपदादिव मुमुचान: स्विन्न: स्नातो मलादिव।  

पुतं पवित्रेणवाज्यमाप: शुन्धन्तु मैनसः 

(यजु 020.20) 

अघमर्षण और आचमन के विनियोग और मंत्र - 

नीचे लिखे विनियोग को पढ़ने के बाद दाहिने हाथ में जल लेकर उसे नाक से लगाकर मंत्र पढ़े और ध्यान करें कि '' समस्त पाप दाहिने नाक से निकल कर हाथ के जल में आ गए हैं।  फिर बिना देखे उस पानी को बाईं ओर फेंक दें।  

उद्धृत्य दक्षिणे हस्ते जलं गोकर्णवत् कृते

निःश्वसन् नासिकाग्रे तु पाप्मानं पुरुषं स्मरेत् 

ऋतं चेति ऋचं वापि द्रुपदां वा जपेद् ऋचम्।  

दक्षनासापुटेनैव पाप्मानमपसारयेत्।  

तज्जलं नावलोक्याथ वामभागे क्षितौ त्यजेत् ।।  

(प्रजापति, देव ११/१६। ४५ - ४७)

अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोग:।  

अघमर्षणसुक्तस्य ऋषिरेवाघमर्षणम्।  

अनुष्टुप् च भवेच्छन्दो भाववृत्तस्तु दैवतम् ।।  

(अग्निपुराण २१५. ४३. ४३)

ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रोऽअर्णवः।।१।। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरोऽअजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।२।। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।३।।

फिर, निम्नलिखित विनियोग करें।  फिर इस मंत्र के साथ आचमन  करें।  

ॐ अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः 

ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्यसंहिता २. ७३ 

फिर से इस मंत्र से आचमन करें

अग्निपुराण में इस मंत्र का पाठ इस प्रकार है- 

अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वामूर्तिषु।  

तपोयज्ञवषट्कार आपो ज्योति रसामृतम्।  

(२१५.४६-४७) 

ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः|

त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् || 

(कात्यायन, परिशिष्ट सूत्र) 

सूर्यार्घ्य - विधि - 

इसके बाद निम्नलिखित विनियोग का पढ़कर अञ्जलि से अँगूठे को अलग हटाकर गायत्री मंत्र से सूर्य , 

मुक्तहस्तेन दातव्यं मुद्रां तत्र न कारयेत्।  तर्जन्यंगुष्ठयोगेन रक्षसीमुद्रिकार्घ्येण तत्तोयं रुधिरं भवेत् ।।  

(अविस्मृति, देवीभा -११|१६|४९)

भगवान् को जल से अर्घ्य दे | अर्घ्य में चन्दन और फूल मिला 

ले | सुबह और दोपहर को एक एड़ी उठाये हुए खड़े होकर अर्घ्य देना चाहिए | सुबह कुछ झुककर खड़े हों और दोपहर को सीधे खड़े होकर और शाम को बैठकर | सुबह और शाम को तीन - तीन अञ्जलि दे और दोपहर को एक अञ्जलि |


सुबह और दोपहर को जल में अञ्जलि उछाले और शाम को धोकर स्वच्छ किये स्थल पर धीरे से अञ्जलि दे | ऐसा नदीतट पर करें | अन्य जगहों में पवित्र स्थल पर अर्घ्य दे, जहाँ किसी का पैर ना लगे | अच्छा है कि किसी बर्तन में अर्घ्य देकर किसी वृक्ष के मूल में डाल दिया जाये 

सूर्यार्घ्य का विनियोग

सूर्य का अर्घ्य देने से पहले, निम्न विनियोग पढ़ें।  

ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अर्घ्यदाने विनियोगः।

(ख)  ॐ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतिना परमेष्ठि प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुपश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्यादेवताः अर्घ्यदाने विनियोगः।

(ग) ॐ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता सूर्यार्घ्यदाने विनियोगः।  


ईषन्नम्र प्रभाते वै मध्याह्ने दण्डवत स्थितः।  

आसने चोपविस्टस्तु द्विजः संध्या क्षिपेदपः।  

जलेष्वर्घ्यं प्रदातव्यं जलाभावे शुचिस्थले।  

सम्प्रोक्ष्य वारिणा सम्यक् ततोेऽर्घ्य तु प्रदापयेत् ।।  (अग्निस्मृति)


इस प्रकार विनियोग कर नीचे लिखे मंत्र का पढ़कर अर्घ्य दें:


ॐ भूर्भुव: स्व:  तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रोचोदयात्।  

(शुकलेज्जु ३६.३) 


इस मंत्र का पढ़कर ब्रह्मस्वरुपिणेे सूर्यनारायणाय नमः' कहकर अर्घ्य दें। 

ॐ भूर्भुव: स्व:  तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रोचोदयात् |ॐ भूर्भुव: स्व:

विशेष - 

यदि समय (सुबह सूर्योदय से और सूर्यास्त के तीन घड़ी बाद) का अतिक्रमण हो जाय  तो प्रायश्चित के रूप में, नीचे लिखे मंत्र से पहले एक अर्घ्य देकर, फिर उक्त अर्घ्य दें।  


उपस्थान - 

सूर्य के उपस्थान के लिए प्रथम निम्नलिखित विनियोगों को पढ़ें।  

उद्वयमित्यस्य प्रस्कण्व र्ऋषिरनुष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः |

(ख) उदु त्यमित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिर्निचृद्गायत्री छंदः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने  विनियोगः। 

 (ग)चित्रमित्यस्य कौत्स ऋषिस्त्रिष्टुप् सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः। 

 (घ) ।  तच्चक्षुरित्यस्य दध्यंथवर्ण ऋषिरक्षरातीतपुरउष्णिकछन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः। 

१ - कालातिक्रमणे चैव त्रिसंध्यमपि सर्वदा।  

चातुर्थ्यार्घ्य प्रकुर्वीत भानोर्व्याहृति न सम्पूटम्।। 

२ - शुकलेज्जुर्वेद - सर्वानुक्रम।  

३ चित्रं देवेती ऋचके ऋषि: कौत्स उदाहृतः त्रिस्टुप् छंदो दैवतं च सूर्योऽस्या परिकीर्तितम्  

(अग्निपुराण २१५.४ ९) 

४ यजुर्वेद - सर्वानुक्रम।


इसके बाद प्रातः चित्र के अनुसार खड़े होकर  और दोपहर में दोनों हाथों को उठाकर और शाम को बैठकर हाथ जोड़कर और नीचे लिखे मंत्रों का पाठ करते हुए सूर्योपस्थान करें।


सूर्योपस्थान का मन्त्र 

(क)  ॐ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् | 

देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरूत्तमम् 

(यजु.२०.२१) 


(ख) ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः दृशे विश्वाय सूर्यम्।  

(यजु-1१४१) 


( ग ) ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।  आप्रा द्यावापृथिवीँ अंतरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।  


(घ) ॐ तच्चक्षुर्देवितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।  पश्येम शरदः शतं जिवेम शरदः शतँ श्रृणुयाम शारदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीना: स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।

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इसके बाद गायत्री जप का विधान है जिसका लिंक उपरोक्त दिया गया है, और यहां भी दिया जा रहा है |

 गायत्री मंत्र के जप का संपूर्ण विधान

गायत्री जप का विधान

सर्व प्रथम ब्रह्म मूहुर्त मे स्नान आदि से निवृत्त होकर गायत्री मां की प्रतिमा के सामने आसन पर आराम से बैठ जाइये 

और मानसिक शुध्दि का मंत्र बोलें और जल छिड़कें


ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा |

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ||

ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु |

गायत्री जपका विधान षडङ्गन्यास - 

गायत्री - मन्त्रके जपके पूर्व षडङ्गन्यास करनेका विधान है।  अतः आगे लिखे एक - एक मन्त्रको बोलते हुए चित्रके अनुसार उन अगोंका स्पर्श करे

ऊँ हृदयाय नमः

ऊँ भूः शिरसे स्वाहा

ऊँ भुवः शिखायै वषट्

ऊँ स्वः कवचाय हुम्

ऊँ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट्

ऊँ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्

आवाहन मंत्र विनियोग

तेजsसीति धामनामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषि‍र्यस्‍त्रि‍ष्‍टुबुष्‍णि‍हौ छन्‍दसी आज्‍यं देवता गायत्र्यावाहने विनियोग

'ॐ तेजोॐसि शुक्रम्रासस्मृतमसि।  धन्मनाशिनी प्रियं देवानाम्ना धृष्टं देवयज्ञमसि।  

 गायत्रीदेवीका उपस्थान (प्रणाम) -आवाहन करने पर गायत्री देवी आ गयी हैं, ऐसे मानकर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे 

गायत्रीयसी विवस्वान् ऋषि ऋषिः स्वराणमपपत्तिमछन्दन्दः परमात्मा गायत्रीपरा।  ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसिद्धि।  न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पद पर परजसेऽसावदो मा प्राप्ति।  

गायत्री - उपस्थानके बाद गायत्री - शापविमोचनका और गायत्री मन्त्र - जपसे पूर्व चौबीस मुद्राओंके करनेका भी विधान है, लेकिन नित्य संज्ञाजनन्यास अनिवार्य न होनेपर भी उन्हें जो विशेषरूपसे करने को तैयार हैं, उनके लिए यहाँ विशेष रूप से दिया जा रहा है।  

गायत्री - शापविमोचन ब्रह्मा, वसिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रके द्वारा गायत्री मन्त्र शापित है।  अतः शाप - निवृत्तिके हेतु शाप - विमोचन करना चाहिए।  

(१) ब्रह्म - शापविमोचन - विनियोग |  

- अस्य श्रीब्रह्म शापविमोचनमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्भुक्तिमुद् ब्रह्मदापविमोचनी गायत्री शक्तिर्देवता गायत्री छन्दः ब्रह्मशापविमोचने विनियोगः।  

ॐ गायत्रीं ब्रह्मेत्युपासीत यद्रूपं ब्रह्मविदो विदुः।  तां पश्यन्ति धीराः सुमनसो वाचामग्रो ।।  ॐ वेदान्तनाथ विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्।  ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं ब्रह्मश्पाद्विमुक्ता भव।

(२) वसिष्ठ - शपविमोचन - विनियोग ओम अस्य श्री वसिष्ठ शापविमोचनमन्त्रस्य निग्राहानुग्रहचार्य वसिष्ठ ऋषिरस्विनस्तुनुग्रहीता गायत्री शक्तिर्देवता विश्वोद्भव गायत्री छन्द: वशिष्ठ शाप विमोचनार्थ जपे विनियोगः

 ॐ सोSहमर्कयमं ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्र: सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् 

योनीमुद्रा दिखाकर तीन बार गायत्री मंत्र जपे।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव।  

(३) विश्वामित्र - शापविमोचन - विनियोग - ऊँ अस्य श्रीविश्वामित्रशापवमोचनमंत्रस्य नूतनसृष्टिकर्ता विश्वामित्रऋषिर्विश्वामित्रानुगृहीता गायत्री शक्तिर्देवता वाग्देहा गायत्री छन्दः विश्वामित्रशापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  मन्त्र 

ऊँ गायत्री भजाम्यग्निमुखिं विश्वगर्भा यदुद्भवाः।  देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टिं तां कल्याणीमिष्टकरीं प्रपद्ये   

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं विश्वामित्रश्चापाद्विमुक्ता भव।  

(४) शुक्र - शापविमोचन - विनियोग -

 ऊँ अस्यश्रीशुक्रशाप विमोचनमन्त्रस्य श्रीशुक्रऋषिः अनुष्टुप्छन्दः देवी गायत्री देवता शुक्रश्चापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  

मन्त्र 

सो्योहमर्कमयं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् ।।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं शुक्रशापाद्विमुक्ता भव।  

प्रार्थना 

ऊँ अहो देवि महादेवी संध्ये विद्ये सरस्वती!  अजरे अमरे चैव ब्रह्म्योनिर्नमोस्तुते ।।  ॐ देवि गायत्री त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भव वसिष्ठाशापाद्विमुक्ता भव, विश्वामित्रशापाद्विविमुक्ता भव, शुक्राशपद्विमुक्ता भव।  

जप से पूर्व की चौबीस मुद्रायें ।  

सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा

द्विमुखम् त्रिमुखम चैव चतुष्पंचमुखम् तथा। 

षण्मुखाsधोमुखं  चैव व्यपाकंजलिकं तथा।  

शकटं यमपाशं च ग्रथितं चोन्मुुखोन्मुखं।  

प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यः कूर्मो वराहकम्। 

 सिंहक्रांतं महाक्रांतं मुद्गरं पल्लवं तथा।  

एता मुद्राश्चतुर्विंशज्जापादौ परिकीर्तिताः ।






गायत्री - मन्त्रका विनियोग - इसके बाद गायत्री मन्त्रके जपके विनियोग पढ़े -

  ऊँकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, ऊँ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतिनां परमेष्ठि प्रजापति

र्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दासि अग्निवायुसूर्या देवताः, ऊँ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः

इसके पश्चात कम से कम 108 बार गायत्री मंत्र का जप करें

गायत्री - मन्त्र 

ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  

शक्तिमन्त्र जपकी करमाला - चित्र - संख्या के अनुसार अंक एकसे आरम्भकर दस अंक तक अँगूठे से जप करनेसे एक करमाला होती है (दे ० भा ० १११। १ ९-९ १ ९) तर्जनीका मध्य और अग्रपर्व ​​सुमेरु है।  इस प्रकार दस करमाला जप करनेसे जप - संख्या एक सौ हो जायगी, तत्पश्चात चित्र - संख्या २ के अनुसार अंक १ से आरम्भ कर अङ्क ८ तक जप करनेसे १०८ की एक माला होती है।



 जपके बादकी आठ मुद्राएँ 

सुरभिर्ज्ञानवैराग्ये योनिः शंखोङथ पंकजम् लिंगनिर्वाणमुद्राश्च जपान्तेsष्टौ प्रदर्शयेत्

सूर्य - प्रदक्षिणा 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।  

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ।।  

भगवानको जपका अर्पण - अंतर्धान भगवान्को यह वाक्यबोलते हुए जप निवेदित करे - 

अनेन गायत्रीजपकर्मणा सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायणः प्रीयतां न मम्।  

गायत्री देवीका विसर्जन - 

निम्नलिखित विनियोगके साथ आगे बताये गये मन्त्रसे गायत्रीदेवीका विसर्जन करे

विनियोग - '

उत्तमे शिखरे' इत्यस्य वामदेव ऋषिरुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।  

गायत्रीके विसर्जनका मन्त्र 

ऊँ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनी।  ब्राह्मणेभ्योऽभ्यानुज्ञाता गच्छ देवि!  यथासुखम्।

संध्योपासनकर्म का समर्पण - 

इसके बाद नीचे लिखे वाक्य पढ़कर संध्योपासनमन को भगवान् को  समर्पित कर दे 

'अनेन संध्योपासनाख्येन कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतां न मम।  ॐ त्सत श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।  

'फिर भगवान् का  स्मरण करे 

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिशु।  न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् श्रीविष्णुवे नमः, श्रीविष्णवे नमः, श्रीविष्णवे नमः| श्रीविष्णुस्मरणात्  परिपूर्णतास्तु।

संध्या समाप्त होने पर पात्रों में बचा जल हुआ ऐसे स्थान या वृक्षकी मूल में गिरा दे जहाँ किसी का भी पाँव न पड़े।  संध्या - समाप्तिके बाद आसनके नीचे किंचित् जल गिराकर उससे मस्तक में  तिलक करे।  




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