बुधवार, 2 सितंबर 2020

संध्योपासन



संध्याके लिए पात्र आदि 
१ - लोटा प्रधान जलपात्र -१ 
२ - घंटी और संध्याका विशेष जलपात्र -१ 
३ - पात्र - चन्दन - पुष्पादिके लिये - १
४ - पञ्चपात्र - २ 
५  - आचमनी - २
६ - अर्घा - १
 ७ जल - जल गिरानेके लिये तामड़ी (छोटी थाली) -१ 
८ - आसन - १







संध्योपासन
 
 - विधि संध्योपासन द्विजमात्रके लिए बहुत ही आवश्यक कर्म है।  इसके बिना पूजा आदि कार्य करनेकी योग्यता नहीं आती है।  अतः द्विज मात्रके लिये संध्या करना आवश्यक है।  

स्नानके बाद दो वस्त्र धारणकर पूर्व, ईशानकोण या उत्तरकी ओर मुंह कर आसनपर बैठ जाय।  आसनकी ग्रन्थि उत्तर - दक्षिणकी ओर हो।  तुलसी, रुद्राक्ष आदि की माला धारण कर ले।  दोनों अनामिकाओं पावित्रि धारण कर ले।  गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बाँधे और तिलक लगा ले और आचमन करे 

आचमन 

- 'ऊँ' केशवाय नमः, 'ऊँ' नारायणाय नमः, 'ऊँ' माधवाय नमः' - इन तीन मन्त्रों से तीन बार आचमन करके 'ॐ हृषीकेशाय नमः' इस मन्त्रको बोलकर हाथ धो लें।  
पहले विनियोग पढ़े, फिर मार्जन करे (जल छिड़कें)।  

१ संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। 
(दक्षस्मृति २। २७) 

निम्नलिखित स्थितिमें संध्याके लोप होने पर पुण्यका साधन होनेके कारण दोष नहीं माना गया है। 

राष्ट्रक्षोभे नृपक्षोभे रोगाते भय आगते।  
देवाग्निद्विजभूपानां कार्ये महति संस्थिते।।  
संध्याहानौ न दोषोऽस्ति यतस्तत् पुण्यसाधनम् ।।  (जमदग्नि) 

२ - जिनके पास संध्या करनेके लिए समयका अभाव हो और संध्याके मन्त्र भी याद न हों, वे कम - से - कम आचमन कर गायत्रीमंत्र से प्राणायाम और गायत्रीमन्त्र तीन बार सूर्यार्घ्य देकर करमाला पर दस बार गायत्री मन्त्रक जप कर लें।  न करनेकी अपेक्षा इतने मात्रसे भी संध्याकी पूर्ति हो सकती है।  

३ संध्या - 
पूजामें आवलेके बराबर रुद्राक्षकी ३२ मणियोंकी माला कण्ठीरूपमें धारण करनेका भी विधान है।

मार्जन - विनियोग - मन्त्र -

 'ऊँ' अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीच्छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।  

'इस प्रकार विनियोग पढ़कर जल छोडे और निम्नलिखित मन्त्रसे मार्जन करे (शरीर और सामग्री पर जल छिड़कें )।  

(नोट - १- विनियोग पढ़कर जल छोड़नेकी विधि शास्त्रों में नहीं मिलने के कारण कुछ विद्वानोंका मत है कि विनियोगों जल छोड़नेका प्रचलन अर्वाचीन है।  मुख्यरूपसे ऋषि, देवता आदिके स्मरणका महत्त्व माना गया है।  इसलिए विनियोगका पाठमात्र भी किया जा सकता है।  
 २ - अग्निपुराण २१५।४३)

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्ववस्थां गतोऽपि वा।  
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः  शुचिः ।। 

 तदनन्तर आगे लिखा विनियोग पढ़े - 

'ऊँ' पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता आसनपवृतिकरणे विनियोगः।  

'फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आसनपर जल छिड़कें  

'ऊँ' पृथ्वि !  त्वया धृता लोका देवि!  त्वं विष्णुना धृता। 
त्वं च धारक मां देवि!  पवित्र कुरु चासनम् ।। 

संध्याका संकल्प - 

इसके बाद हाथमे कुश और जल लेकर संध्या का संकल्प पढ़कर जल गिरा दे -
 'ऊँ'विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पेवैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतखण्डे भारतवर्षे....स्थाने... नामसंवत्सरे...  ऋतौ ...मासे.... पक्षे....तिथौ.... दिने...... प्रातःकाले... गोत्रः (शर्मा, वर्मा, गुप्तः) उपात्तदुरितक्षयपूर्वकश्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं संध्योपासनं करिष्ये।  

'आचमन - 
इसके लिए निम्नलिखित विनियोग पढ़े

 'ऊँ' ऋतं चेति माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्पर्शने विनियोगः।  

फिर नीचे लिखे मन्त्र पढ़कर आचमन करे 

'ऊँ' ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत ।  ततो रात्र्यजायत।  ततः समुद्रो अर्णवः।  समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।  अहोरात्राणि विद्द्वद्विश्वस्य मिष्तो वशी।  सूर्याचंद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।  दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।  
(ऋग्वेद १०। १ ९ ० / १) 

तन्नन्तर दायें हाथमें जल लेकर बायें हाथसे ढककर 'ऊँ' के साथ तीन बार गायत्रीमन्त्र पढ़कर अपनी रक्षाके लिए अपने चारों ओर जल धारा दे। 

क्रमशः

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