सोमवार, 31 अगस्त 2020

गायत्री जप का विधान

  



 गायत्री मंत्र के जप का संपूर्ण विधान

वैसे गायत्री मंत्र का पाठ किसी भी प्रकार से करने पर लाभ प्राप्त होता है लेकिन उसे विधि पुर्वक करने के अपना अलग हि महत्व है

जैसे

दरिद्रता का नाश

सन्तान सम्बन्धी परेशानी से छुटकारा 

शत्रु परास्त होते हैं

विवाह कार्य में अड़चन में लाभ

रोग निवारण मे सहायक आदि अनेक लाभ हैं मां गायत्री जप के

गायत्री जप का विधान

सर्व प्रथम ब्रह्म मूहुर्त मे स्नान आदि से निवृत्त होकर गायत्री मां की प्रतिमा के सामने आसन पर आराम से बैठ जाइये 

और मानसिक शुध्दि का मंत्र बोलें और जल छिड़कें


ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा /

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः //

ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु /




गायत्री - जपका विधान षडङ्गन्यास - गायत्री - मन्त्रके जपके पूर्व षडङ्गन्यास करनेका विधान है।  अतः आगे लिखे एक - एक मन्त्रको बोलते हुए चित्रके अनुसार उन अगोंका स्पर्श करे



ऊँ हृदयाय नमः

ऊँ भूः शिरसे स्वाहा

ऊँ भुवः शिखायै वषट्

ऊँ स्वः कवचाय हुम्

ऊँ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट्

ऊँ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्



आवाहन मंत्र विनियोग


तेजsसीति धामनामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषि‍र्यस्‍त्रि‍ष्‍टुबुष्‍णि‍हौ छन्‍दसी आज्‍यं देवता गायत्र्यावाहने विनियोग


'ॐ तेजोॐसि शुक्रम्रासस्मृतमसि।  धन्मनाशिनी प्रियं देवानाम्ना धृष्टं देवयज्ञमसि।  

 गायत्रीदेवीका उपस्थान (प्रणाम) -आवाहन करने पर गायत्री देवी आ गयी हैं, ऐसे मानकर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे 

गायत्रीयसी विवस्वान् ऋषि ऋषिः स्वराणमपपत्तिमछन्दन्दः परमात्मा गायत्रीपरा।  ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसिद्धि।  न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पद पर परजसेऽसावदो मा प्राप्ति।  

गायत्री - उपस्थानके बाद गायत्री - शापविमोचनका और गायत्री मन्त्र - जपसे पूर्व चौबीस मुद्राओंके करनेका भी विधान है, लेकिन नित्य संज्ञाजनन्यास अनिवार्य न होनेपर भी उन्हें जो विशेषरूपसे करने को तैयार हैं, उनके लिए यहाँ विशेष रूप से दिया जा रहा है।  

गायत्री - शापविमोचन ब्रह्मा, वसिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रके द्वारा गायत्री मन्त्र शापित है।  अतः शाप - निवृत्तिके हेतु शाप - विमोचन करना चाहिए।  

(१) ब्रह्म - शापविमोचन - विनियोग |  

- अस्य श्रीब्रह्म शापविमोचनमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्भुक्तिमुद् ब्रह्मदापविमोचनी गायत्री शक्तिर्देवता गायत्री छन्दः ब्रह्मशापविमोचने विनियोगः।  

ॐ गायत्रीं ब्रह्मेत्युपासीत यद्रूपं ब्रह्मविदो विदुः।  तां पश्यन्ति धीराः सुमनसो वाचामग्रो ।।  ॐ वेदान्तनाथ विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्।  ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं ब्रह्मश्पाद्विमुक्ता भव।


(२) वसिष्ठ - शपविमोचन - विनियोग ओम अस्य श्री वसिष्ठ शापविमोचनमन्त्रस्य निग्राहानुग्रहचार्य वसिष्ठ ऋषिरस्विनस्तुनुग्रहीता गायत्री शक्तिर्देवता विश्वोद्भव गायत्री छन्द: वशिष्ठ शाप विमोचनार्थ जपे विनियोगः


 ॐ सोSहमर्कयमं ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्र: सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् 

योनीमुद्रा दिखाकर तीन बार गायत्री मंत्र जपे।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव।  


(३) विश्वामित्र - शापविमोचन - विनियोग - ऊँ अस्य श्रीविश्वामित्रशापवमोचनमंत्रस्य नूतनसृष्टिकर्ता विश्वामित्रऋषिर्विश्वामित्रानुगृहीता गायत्री शक्तिर्देवता वाग्देहा गायत्री छन्दः विश्वामित्रशापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  मन्त्र 

ऊँ गायत्री भजाम्यग्निमुखिं विश्वगर्भा यदुद्भवाः।  देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टिं तां कल्याणीमिष्टकरीं प्रपद्ये   

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं विश्वामित्रश्चापाद्विमुक्ता भव।  


(४) शुक्र - शापविमोचन - विनियोग -

 ऊँ अस्यश्रीशुक्रशाप विमोचनमन्त्रस्य श्रीशुक्रऋषिः अनुष्टुप्छन्दः देवी गायत्री देवता शुक्रश्चापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  

मन्त्र 

सो्योहमर्कमयं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् ।।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं शुक्रशापाद्विमुक्ता भव।  

प्रार्थना 

ऊँ अहो देवि महादेवी संध्ये विद्ये सरस्वती!  अजरे अमरे चैव ब्रह्म्योनिर्नमोस्तुते ।।  ॐ देवि गायत्री त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भव वसिष्ठाशापाद्विमुक्ता भव, विश्वामित्रशापाद्विविमुक्ता भव, शुक्राशपद्विमुक्ता भव।  

जप से पूर्व की चौबीस मुद्रायें ।  

सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा

द्विमुखम् त्रिमुखम चैव चतुष्पंचमुखम् तथा। 

षण्मुखाsधोमुखं  चैव व्यपाकंजलिकं तथा।  

शकटं यमपाशं च ग्रथितं चोन्मुुखोन्मुखं।  

प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यः कूर्मो वराहकम्। 

 सिंहक्रांतं महाक्रांतं मुद्गरं पल्लवं तथा।  

एता मुद्राश्चतुर्विंशज्जापादौ परिकीर्तिताः ।






गायत्री - मन्त्रका विनियोग - इसके बाद गायत्री मन्त्रक जपके विनियोग पढ़े -

  ऊँकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, ऊँ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतिनां परमेष्ठि प्रजापति

र्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दासि अग्निवायुसूर्या देवताः, ऊँ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः

इसके पश्चात कम से कम 108 बार गायत्री मंत्र का जप करें


गायत्री - मन्त्र 

ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  


शक्तिमन्त्र जपकी करमाला - चित्र - संख्या के अनुसार अंक एकसे आरम्भकर दस अंक तक अँगूठे से जप करनेसे एक करमाला होती है (दे ० भा ० १११। १ ९-९ १ ९) तर्जनीका मध्य और अग्रपर्व ​​सुमेरु है।  इस प्रकार दस करमाला जप करनेसे जप - संख्या एक सौ हो जायगी, तत्पश्चात चित्र - संख्या २ के अनुसार अंक १ से आरम्भ कर अङ्क ८ तक जप करनेसे १०८ की एक माला होती है।



 जपके बादकी आठ मुद्राएँ 

सुरभिर्ज्ञानवैराग्ये योनिः शंखोङथ पंकजम् लिंगनिर्वाणमुद्राश्च जपान्तेsष्टौ प्रदर्शयेत्



सूर्य - प्रदक्षिणा 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।  

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ।।  

भगवानको जपका अर्पण - अंतर्धान भगवान्को यह वाक्यबोलते हुए जप निवेदित करे - 

अनेन गायत्रीजपकर्मणा सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायणः प्रीयतां न मम्।  

गायत्री देवीका विसर्जन - निम्नलिखित विनियोगके साथ आगे बताये गये मन्त्रसे गायत्रीदेवीका विसर्जन करे

विनियोग - '

उत्तमे शिखरे' इत्यस्य वामदेव ऋषिरुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।  

गायत्रीके विसर्जनका मन्त्र 

ऊँ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनी।  ब्राह्मणेभ्योऽभ्यानुज्ञाता गच्छ देवि!  यथासुखम्।







क्षौरकर्म

 



सनातन धर्म में शास्त्रो ने हर मनुष्य मात्र को हर कर्म को करने की उपयुक्त समय और विधान पहले ही बना दिया था 

आइये जाने कुछ क्षौर - कर्म के कुछ विधि तथा निषेध दोनों पक्ष 


१- (क) श्मश्रूण्यग्रे वापयतेऽथोपकक्षावथ केशानथ लोमान्यथ नखानि।  (गृह्यसूत्र) 


(ख) अथैतन्मनुर्प्त्रे मिथुनमपश्यत्।  स शमश्रुण्यग्रेऽवपत्।  अथोपकक्षौ अथ केशान्।  (तैत्तिरीय ब्राहाण) 


क्षौर - कर्म या बाल कटवानेका निम्नलिखित क्रम निर्दिष्ट किया है।  पहले दाढ़ी दाहिनी ओरसे पूरी बनवा ले, फिर मूंछको फिर बगल में बाल और सिरके केशको और इसके बाद अन्य रोमोंको कटवाना चाहिए।  अन्त में नखों के कटवानेका विधान है। 


 एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, व्यतिपात, विष्टि (भद्रा), व्रतके दिन, श्राद्धके दिन और मंगल, शनिवारको क्षौरकर्म वर्जित है। 


२ - भानुर्मासं क्षपयति तथा सप्त मार्तण्डसूनु भौमश्चाष्टौ वितरति शुभान् बोधन: पञ्चमासान्।  सप्तैवेन्दुर्दश सुरगुरु: शुक्र एकादशेति प्राहुर्गर्गप्रभृतिमुनयः क्षौरकार्येषु  नूनम्।

(वाराहीसंहिता)


 क्षौरकर्म में गर्गादि मुनियोंका कथन है कि रविवारको क्षौर प्रदानसे एक मास की, शनिवार को सात मासकी और मंगलवार को आठ मास की आयु को, उस - उस दिनके अभिमानी देवता क्षीण कर देते हैं।  इसी प्रकार बुधवारको क्षौर कराने से पाँच मास की, सोमबार को सात मास की, गुरुवार को दस मास की और शुक्रवार को ग्यारह मास की आयु की, उस - उस दिनके अभिमानी देवता वृद्धि करते हैं।  पुत्रेच्छु गृहस्थों और एक पुत्रवाले को सोमवार को और विद्या और लक्ष्मी के इच्छुक को गुरुवार को क्षौर नहीं कराना चाहिए।

संध्या - प्रकरण

  


 



  संध्या - प्रकरण 

संध्या वन्दन करना हर मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है आइये जाने

संध्याका समय - 

१ उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततरका।  

अधमा सुरसहिता प्रात: संध्या त्रिधा स्मृता ।।  

(धर्मार, विश्वामित्रस्म -१.२२, देवीभा ० ११, १६॥ ४)


सूर्योदयसे पूर्व जब उस आकाशमें तारे भरे हुए हों, उस समयकी संध्या उत्तम मानी गयी है।  तारोंके छिपनेसे सूर्योदयतक मध्यम और सूर्योदयके बादकी संध्या अधम होती है।  


२ - उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमा लुप्तसूर्यका।  

अधम तारकोपेता सायं संध्या त्रिधा स्मृता ।।  

(धर्मार, विश्वामित्रस्म १.२४)


सायंकालकी संध्या सूर्यके रहते कर ली जाय तो उत्तम, सूर्यास्तके बाद और तारों के निकलनेके पूर्व मध्यम और तारा निकलनेके बाद अधम मानी गयी है।  


   संध्याकी आवश्यकता 


नियमपूर्वक जो लोग प्रतिदिन संध्या करते हैं, वे पापरहित होकर सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं 


संध्यामुपासते ये तू सततं संशितव्रताः।  

विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम् 

(अत्रि) 



इस पृथ्वीपर जितने भी स्वकर्मरहित द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)) हैं, उन्हें पवित्र करनेके लिए ब्रह्माने संध्याकी उत्पत्ति की है।  रात या दिन जो भी अज्ञानवश विकर्म हो, वे त्रिकाल - संध्या करनेसे नष्ट हो जाते हैं 


यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः। 

 तेषां वै पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयम्भुवा ।।  

निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत्।  त्रैकाल्यसंध्याकरणात् तत्सर्वं विप्रणश्यति।  

(याज्ञवल्क्यस्मृ० प्रयश्चिताध्याय ३०७) 


  संध्या न करनेसे दोष 


जिसने संध्याका ज्ञान नहीं किया, जिसने संध्याकी उपासना नहीं की, वह (द्विज) जीवित रहते शूद्र - सम रहता है और मृत्युके पश्चात कुत्ते आदि की योनिको प्राप्त करता है 


संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता।  

जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजयते  

(दे भा ११। १६।७।) 


ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य आदि संध्या नहीं करें, तो वे अपवित्र हैं और उन्हें किसी पुण्यकर्मके करनेका फल प्राप्त नहीं होता।  


संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।  

यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्   

(दक्षस्मृ० २.२७) 


 संध्या - कालकी व्याख्या


 सूर्य और तारोंसे रहित दिन - रातकी संधिको तत्त्वदर्शी मुनियोंने संध्याकाल माना है 


अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता।  

सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।।  

(आचारभूषण ८९) 


 संध्यास्तुति 


ब्राह्मणरूपी वृक्षका मूल संध्या है, चारों वेद चार शाखाएँ हैं, धर्म और कर्म पत्ते हैं।  अतः मूलकी रक्षा यत्नसे चाहिए।  मूलके छिन्न हो जाने पर वृक्ष और शाखा कुछ भी नहीं रह सकते हैं 


विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्।  

तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ।। 

 (देवीभा -११। १६। ६) 


समयपर की गयी संध्या इच्छानुसार फल देती है और बिना समयकी की गयी संध्या वन्ध्या स्त्रीके समान होती है 


स्वकाले सेविता संध्या नित्यं कामदुघा भवेत्।  

अकाले सेविता सा च संध्या वन्ध्या वधूरिव ।।  

(मित्रकल्प) 


प्रात: कालमें तारों के रहते हुए, मध्याह्नकालमें जब सूर्य आकाशके मध्यमें हों, सायंकालमें सूर्य्यस्तके पहले ही इस तरह तीन प्रकारकी संध्या करनी चाहिए 


प्रात: संध्यां सनक्षत्रां मध्याह्ने मध्यभास्कराम् ।।  

ससूर्यां पश्चिमां संध्यां तिस्र: संध्या उपासते।  

(दे.भा.११/१६/२-३) 


सायंकाल में पश्चिम की तरफ मुख करके जब तक तारों का उदय न हो और प्रातःकाल में पूर्व की ओर मुख करके जबतक सूर्य का दर्शन न हो तबतक जप करता रहे


जपन्नासीत सावित्रीम्प्रत्यगातारकोदयात //

 संध्या प्राक् प्रातरेवं हि तिष्ठेदासूर्यदर्शनात्।  

(या स्मृ २.२४-२५) 


गृहस्थ और ब्रह्मचारी गायत्रीके आदिमें 'ऊँ' का उच्चारण करके जप करें, और अंत में 'ऊँ' का उच्चारण न करें, क्योंकि ऐसा करनेसे सिद्धि नहीं होती है 


गृहस्थो ब्रह्मचारी च प्रणवाद्यामिमां जपेत्।  

अन्ते यः प्रणवं कुर्यान्नासौ सिद्धिमवाप्नुयात् ।।  

(याज्ञवल्क्य स्मृ ०, आचाराध्याय २४-२५ बालम्भट्टी)



जपके आदिमें चौंसठ कलायुक्त विद्याओं और सम्पूर्ण ऐश्वर्योका सिद्धिदायक 'गायत्री - हृदय' का और अन्त में 'गायत्री - कवच' का पाठ करें।  (यह नित्य - संध्या में आवश्यक नहीं है, पर अगर करे तो अच्छा है) 


चतुष्षष्टिकला विद्या सकलैश्वर्यसिद्धिदा।  

जपारम्भे च हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ।।  


घरमें संध्या - वन्दन करनेसे एक, गोस्थानमें सौ, नदी - किनारे लाख तथा शिवके समीपमें अनन्त गुना फल होता है 


गृहेषु तत्समा संध्या गोष्ठे शतगुणा स्मृता।  

नद्यां शतगुणा प्रोक्ता अनन्ता शिवसंनिधौ  

(लघुशातातपस्मृ ० ११४)


 पैर धोनेसे, पीनेसे और संध्या करनेसे बचा हुआ जल श्वानके मूत्रके तुल्य हो जाता है, उसे पीनेपर चान्द्रायण - व्रत करनेसे मनुष्य पवित्र होता है।  इसलिये बचे हुए जलको फेंक दे 


पादशेषं पीतशेषं संध्याशेषं चवैव च।  

शुनो मूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चेरेत् //






रविवार, 30 अगस्त 2020

तिलक


 तिलक - धारण - प्रकार 

गंगा, मृत्तिका या गोपी - चन्दनसे ऊर्ध्वपुण्ड्र, भस्मसे त्रिपुण्ड्र और श्रीखण्डचन्दनसे दोनों प्रकारका तिलक कर सकते हैं।  किंतु उत्सवकी रात्री में सर्वांग में चन्दन लगाना चाहिए।  


१ ऊर्ध्वपुण्ड्रं मृदा कुर्याद् भस्मना तु त्रिपुण्ड्रकम्।। 

   उभयं चन्दनेनैव अभ्यङगोत्सवरात्रिषु   

२ - ललाटे तिलकं कृत्वा संध्याकर्म समाचरेत्।  

   अकृत्वा भालतिलकं तस्य कर्म निरर्थकम् ।। 

 (प्रयोग पपीजत) 

३- (क) मृत्तिका चन्दनं चैव भस्म तोय चतुर्थकम्।  एभिर्द्रव्यैर्यथाकालमूर्ध्वपुण्ड्रं समचरेत् 

(ब्रह्माण्डपुराण) 

(ख) यहाँ केवल भस्म - धारण - विधि दी गयी है, अन्य लोगोंको भी अपने - अपने सम्प्रदाय और आचारके अनुसार तिलक धारण करना चाहिए।  

४ - सत्यं शौचं जपो होमस्तीर्थ देवादिपूजनम्।  

तस्य व्यर्थमिदं सर्वं यस्त्रिपुण्ड्रं न धारयेत् ।। 

 ('भविष्यपुराण)


भस्मादि - तिलक - विधि - 

तिलकके बिना सत्कर्म सफल नहीं हो पाते।  तिलक बैठकर लगाना चाहिए।  अपने - अपने आचारके अनुसार मिट्टी, चंदन और भस्म- इनमें से किसीके द्वारा तिलक लगाना चाहिए।  ।  किंतु भगवान् पर चढ़ानेसे बचे हुए चन्दनको ही लगाना चाहिए।  अपने लिए न घिसे।  अँगूठे से नीचेसे ऊपरकी ओर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर तब त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिए।  दोपहरसे पहले जल मिलाकर भस्म लगाना चाहिए।  


१ - मध्याह्नात प्राक् जलाक्तं तु परतो जलवर्जितम्।       

   तर्जन्यनामिकाङ्गुष्ठैस्त्रिपुण्ड्रं तु समाचरेत्   

(देवीभागवत) 

२ - प्रात: ससलिलं भस्म मध्याह्ने गन्धमिश्रितम्।  

सायाह्ने निर्जलं भस्म एवं भस्म विलेपयेत्  

३ मध्यमानामिकाङ्गुष्ठैरनुलोमविलोमत:

 अतिस्वल्पमनायुष्यमतिदीर्घं तपःक्षयम्   

(देवीभागवत) 

४ - निरन्तरालं यः कुर्यात् त्रिपुण्ड्रं स नराधामः।  

(पयपुराण) 

५ - नेत्रयुग्मप्रमाणेन भाले दीप्तं त्रिपुण्ड्रकम्।  

(दे भा ०११। १५। २३३) 



दोपहर के बाद जल न मिलावे।  मध्याह्नमें चन्दन मिलाकर और शामको सूखा ही भस्म लगाना चाहिए।  जलसे भी तिलक लगाया जाता है।  अँगूठे से ऊर्ध्वपुण्ड्र करनेके बाद मध्यमा और अनामिकासे बायीं ओरसे प्रारम्भ कर दाहिनी ओर भस्म लगावे।  इसके बाद अँगूठे से दाहिनी ओरसे प्रारम्भ कर बायीं ओर लगावे।  इस प्रकार तीन रेखाएँ खींच जाती हैं।  तीनों अंगुलियोंके मध्यका स्थान रिक्त रखे।  नेत्र रेखाओंकी सीमा हैं, अर्थात् बायें नेत्रसे दाहिने नेत्रक ही भस्मकी रेखाएँ होंगी।  इससे अधिक लम्बी और छोटी  होना भी हानिकर है।  इस प्रकार रेखाओंकी लम्बाई छ: अंगुल होती है।  यह विधि ब्राह्मणोंके लिए है।  क्षत्रियोंको चार अंगुल, वैश्योंको दो अंगुल और शूद्रोंको एक ही अंगुल लगाना चाहिए।  

(क) भस्मका अभिमन्त्रण - 

भस्म लगानेसे पहले भस्मको अभिमंत्रित कर लेना चाहिए।  भस्मको बायीं हथेलीपर रखने जलाडी सहित निम्नलिखित मन्त्र पढ़े

 ऊँ अग्निरिति भस्म।  ॐ वायुरिति भस्म।  ॐ जलमिति भस्म।  ॐ स्थलमिति भस्म।  ॐ व्योमतेति भस्म।  ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म।  ॐ मन एतानि चुक्षूंषि भस्मानीति।  


(ख) भस्म लगानेका मन्त्र - 

इसके बाद ॐ नमः शिवाय ’मन्त्र बोलते हुए ललाट, ग्रीवा, भुजाओं और हृदय भस्म लगाये।  या निम्नलिखित भिन्न - भिन्न मन्त्र बोलते हुए भिन्न - भिन्न स्थानों पर भस्म लगाये 

ऊँ त्र्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे।  ॐ कश्यपस्य त्रायुषमिति ग्रीवायाम्।  ॐ यद्देवेषु त्रायुषमिति भुजायाम्।  ऊँ तन्नो अस्तु    त्रायुषमिति हृदये।

यज्ञोपवीत

  





यज्ञोपवीत - धारण करनेकी आवश्यकता 


उपनयनके समय पिता और आचार्यद्वारा त्रैवर्णिक वटुओं को जो यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है, ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ - तीनों आश्रमों में उसे अनिवार्यतः अखण्डरूप में धारण किये रहने का शास्त्रोंका आदेश है।  किंतु धारण किया हुआ यज्ञोपवीत अवस्था - विशेष में बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करना पड़ता है 




यज्ञोपवीत कब बदलें ?  


१ - वामहस्ते व्यतीते तु तत् त्यक्त्वा धारयेत् नवम्।  


२ - पतितं त्रुटितं वापि ब्रह्मसूत्रं यदा भवेत्।  


     नूतनं धारयेद्विप्र: स्नात्वा संकल्पपूर्वकम् ।।  


३ - मलमूत्रे त्यजेद् विप्रो विस्मृतैवोपवितधृक्।  


     उपवीतं तदुत्सृज्य दध्यादन्यन्नवं तदा ।।  


     (आचारेन्दु, पृष्ठभूमि। २४५) 


४ - चितिकाष्ठं चितेर्धूमं चण्डालं च रजस्वलाम्।


     शवं च सूतिकां स्पृष्ट्वा सचैलो जलमाविशेत् 


     त्यजेत् वस्त्रं च सूत्रं च


     (आचारेन्दु, पृष्ठभूमि। २४५ में अभिलायन) 


५ - यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि।


     तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावे तदिष्यते।  


     (विश्वामित्र) 


६ - उपवीतं वटोरेकं द्वे तथेतरयो: स्मृते।  (देवल)




यदि यज्ञोपवीत कंधेसे सरककर बायें हाथके नीचे आ जाय, गिर जाय कोई धागा टूट जाय, शौच आदिके समय कान पर डालना भूल जाय और अस्पृश्य से स्पर्श हो जाय तो नये यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये।  गृहस्थ और वानप्रस्थ - आश्रम वाले को दो यज्ञोपवीत पहनना आवश्यक है।  ब्रह्मचारी एक जनेऊ पहन सकता है।  चादर और गमछेके लिए एक यज्ञोपवीत और धारण करे।  




१  धारणाद् ब्रह्मसूत्रस्य गते मासचतुष्टये।  


    त्यक्त्वा तान्यपि जीर्णानि नवान्यन्यानि धारयेत् ।।  


    (गोभिल आचारभूषण, पृष्ठभूमि। ५५)


२ - उपाकर्मणि चोत्सर्गे सूतकद्वितये तथा।  


    श्राद्धकर्मणि यज्ञादौ शशिसूर्येऽपि च ।।


    नवयज्ञोपवीतानि धृत्वा जीर्णानि च त्यजेत् ।।


    (ज्योतिषार्णव) 


३.अाकटेस्तत्प्रमाणं स्यात्।  


४ - ओंकाराग्नी तथा सर्पान् सोमपितृप्रजापतीन्।  


    वायुं सूर्यं च विश्वांश्च देवान् नवसु तन्तुषुु।  


५ - यदि श्रावणी - पूजनमें यज्ञोपवीतको अभिमन्त्रित कर लिया गया तो पुनः संस्कारकी आवश्यकता नहीं है, केवल धारण - विधिसे धारण कर लेना चाहिए।


चार महीने बीत गए नया यज्ञोपवीत पहन ले।  इसी तरह उपाकर्म में, जननाशौच और मरणाशौच में, श्राद्धमें, यज्ञ आदिमें, चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहणकेे उपरान्त भी नये यज्ञोपवीतोंका धारण करना अपेक्षित है।  यज्ञोपवीत कमरतक रहे।  




जैसे पत्थर ही भगवान् नहीं होता, प्रत्युत मन्त्रोंसे भगवान् को उसमें प्रतिष्ठित किया जाता है, उसी प्रकार यज्ञोपवीत धागा मात्र नहीं होता है।  प्रत्युत निर्माणके समयसे ही यज्ञोपवीतमें संस्कारोंका आधान होने लगता है।  बन जाने पर इसके ग्रन्थियों में और नवों तन्तुओं में ओंकार, अग्नि आदि भिन्न भिन्न देवताओं के आवाहन आदि कर्म होते हैं।  लोग सुविधाके लिये एक वर्षके लिये श्रावणीमें यज्ञोपवीतको अभिमन्त्रित कर रख लेते हैं और आवश्यकता पड़नेपर धारण विधिसे इसे पहन लेते हैं।  यदि श्रावणीका यज्ञोपवीत न हो तो निम्नलिखित विधिसे उसे संस्कृत कर ले।  




यज्ञोपवीत - संस्कार एवं धारणकी विधि 


यज्ञोपवीतमें भगवानके आवाहनकी विधि - 


यज्ञोपवीतको पलाश आदिके पत्ते पर रख कर जलसे प्रक्षालित करे, फिर निम्नलिखित एक - एक मन्त्र पढ़ कर चावल या एक - एक फूलको यज्ञोपवीतपर छोड़ता जाय।




प्रथमतन्तौ ऊँ ओंकारमावाहयामि।  द्वितीयतन्तौ ऊँ अग्निमावाहयामि।  तृतीयतन्तौ ऊँ सर्पनावाहयामि।  चतुर्थतन्तौ ॐ सोममावाहयामि।  पञ्चमतन्तौ ऊँ पितृनावाहयामि।  षष्ठतन्तौ ऊँ प्रजापतिमावाहयामि।  सप्तमतन्तौ ऊँ अनिलमावाहयामि।  अष्टमतन्तौ ऊँ सूर्यमावाहयामि।  नवमतन्तौ ऊँ विश्वान् देवनावाहयामि।  प्रथमग्रन्थौ ऊँ ब्रह्मणे नमः, ब्रह्माणमावाहयामि ।  द्वितीयग्रन्थौ ऊँ विष्णवे नमः, विष्णुमावाहयामि।  तृतीयग्रन्थौ ऊँ रुद्राय नमः, रुद्रमावाहयामि।  


इसके बाद 'प्रणवाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:' - इस मन्त्रसे 'यथास्थानं न्यसामि' कहकर उन - उन तन्तुअोंमें न्यास कर चन्दन आदिसे पूजन करें।  फिर जनेऊको दस बार गायत्री मंत्रसे अभिमन्त्रित करे। 


 यज्ञोपवीत - धारण - विधि - 


इसके बाद नूतन यज्ञोपवीत धारणका संकल्पकर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर जल गिरायें।  फिर मन्त्र पढ़कर एक जनेऊ पहने, इसके बाद आचमन करे।  फिर दूसरा यज्ञोपवीत धारण करे।  एक - एक कर यज्ञोपवीत पहनना चाहिए। 




 १ यज्ञोपवीतमेकैकं प्रतिमन्त्रेण धारयेत्।  


आचम्य प्रतिसकल्पं धारयेन्मनुरब्रवीत् ।। 


 (पराशर, आचारभूषण, पृष्ठभूमि। ५४) 




 विनियोग - ऊँ यज्ञोपवीमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषिः, लिङ्गोक्ता देवताः, त्रिस्टुप् छन्दः, यज्ञोपवीतधारणे विनियोगः।  




निम्नलिखित मन्त्रसे जनेऊ पहने 


ऊँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् ।  आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।  


ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।  




२ मन्त्रेण धारणं कार्य मन्त्रेण च विसर्जनम्। 


 कर्तव्यं च सदा सद्धिर्नात्र कार्या विचारणा ।।


 (मनु)




जीर्ण यज्ञोपवीत का त्याग - इसके बाद मन्त्र पढ़कर 'पुराने जनेऊको कण्ठी - जैसा बनाकर सिरपरसे पीठ की ओर 


निकालकर उसे जलमें प्रवाहित कर दे 


एतावद्दीनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।  


जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम् 


इसके बाद यथाशक्ति गायत्री मन्त्रका जप करे और आगेका वाक्य बोलकर भगवान्  अर्पित कर दें 


ऊँ तत्सत् श्रीब्राह्मार्पणमस्तु।  फिर हाथ जोड़कर भगवान् का स्मरण करे।




विष्णु पुराण द्वितीय अध्याय

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