तिलक - धारण - प्रकार
गंगा, मृत्तिका या गोपी - चन्दनसे ऊर्ध्वपुण्ड्र, भस्मसे त्रिपुण्ड्र और श्रीखण्डचन्दनसे दोनों प्रकारका तिलक कर सकते हैं। किंतु उत्सवकी रात्री में सर्वांग में चन्दन लगाना चाहिए।
१ ऊर्ध्वपुण्ड्रं मृदा कुर्याद् भस्मना तु त्रिपुण्ड्रकम्।।
उभयं चन्दनेनैव अभ्यङगोत्सवरात्रिषु
२ - ललाटे तिलकं कृत्वा संध्याकर्म समाचरेत्।
अकृत्वा भालतिलकं तस्य कर्म निरर्थकम् ।।
(प्रयोग पपीजत)
३- (क) मृत्तिका चन्दनं चैव भस्म तोय चतुर्थकम्। एभिर्द्रव्यैर्यथाकालमूर्ध्वपुण्ड्रं समचरेत्
(ब्रह्माण्डपुराण)
(ख) यहाँ केवल भस्म - धारण - विधि दी गयी है, अन्य लोगोंको भी अपने - अपने सम्प्रदाय और आचारके अनुसार तिलक धारण करना चाहिए।
४ - सत्यं शौचं जपो होमस्तीर्थ देवादिपूजनम्।
तस्य व्यर्थमिदं सर्वं यस्त्रिपुण्ड्रं न धारयेत् ।।
('भविष्यपुराण)
भस्मादि - तिलक - विधि -
तिलकके बिना सत्कर्म सफल नहीं हो पाते। तिलक बैठकर लगाना चाहिए। अपने - अपने आचारके अनुसार मिट्टी, चंदन और भस्म- इनमें से किसीके द्वारा तिलक लगाना चाहिए। । किंतु भगवान् पर चढ़ानेसे बचे हुए चन्दनको ही लगाना चाहिए। अपने लिए न घिसे। अँगूठे से नीचेसे ऊपरकी ओर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर तब त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिए। दोपहरसे पहले जल मिलाकर भस्म लगाना चाहिए।
१ - मध्याह्नात प्राक् जलाक्तं तु परतो जलवर्जितम्।
तर्जन्यनामिकाङ्गुष्ठैस्त्रिपुण्ड्रं तु समाचरेत्
(देवीभागवत)
२ - प्रात: ससलिलं भस्म मध्याह्ने गन्धमिश्रितम्।
सायाह्ने निर्जलं भस्म एवं भस्म विलेपयेत्
३ मध्यमानामिकाङ्गुष्ठैरनुलोमविलोमत:
अतिस्वल्पमनायुष्यमतिदीर्घं तपःक्षयम्
(देवीभागवत)
४ - निरन्तरालं यः कुर्यात् त्रिपुण्ड्रं स नराधामः।
(पयपुराण)
५ - नेत्रयुग्मप्रमाणेन भाले दीप्तं त्रिपुण्ड्रकम्।
(दे भा ०११। १५। २३३)
दोपहर के बाद जल न मिलावे। मध्याह्नमें चन्दन मिलाकर और शामको सूखा ही भस्म लगाना चाहिए। जलसे भी तिलक लगाया जाता है। अँगूठे से ऊर्ध्वपुण्ड्र करनेके बाद मध्यमा और अनामिकासे बायीं ओरसे प्रारम्भ कर दाहिनी ओर भस्म लगावे। इसके बाद अँगूठे से दाहिनी ओरसे प्रारम्भ कर बायीं ओर लगावे। इस प्रकार तीन रेखाएँ खींच जाती हैं। तीनों अंगुलियोंके मध्यका स्थान रिक्त रखे। नेत्र रेखाओंकी सीमा हैं, अर्थात् बायें नेत्रसे दाहिने नेत्रक ही भस्मकी रेखाएँ होंगी। इससे अधिक लम्बी और छोटी होना भी हानिकर है। इस प्रकार रेखाओंकी लम्बाई छ: अंगुल होती है। यह विधि ब्राह्मणोंके लिए है। क्षत्रियोंको चार अंगुल, वैश्योंको दो अंगुल और शूद्रोंको एक ही अंगुल लगाना चाहिए।
(क) भस्मका अभिमन्त्रण -
भस्म लगानेसे पहले भस्मको अभिमंत्रित कर लेना चाहिए। भस्मको बायीं हथेलीपर रखने जलाडी सहित निम्नलिखित मन्त्र पढ़े
ऊँ अग्निरिति भस्म। ॐ वायुरिति भस्म। ॐ जलमिति भस्म। ॐ स्थलमिति भस्म। ॐ व्योमतेति भस्म। ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म। ॐ मन एतानि चुक्षूंषि भस्मानीति।
(ख) भस्म लगानेका मन्त्र -
इसके बाद ॐ नमः शिवाय ’मन्त्र बोलते हुए ललाट, ग्रीवा, भुजाओं और हृदय भस्म लगाये। या निम्नलिखित भिन्न - भिन्न मन्त्र बोलते हुए भिन्न - भिन्न स्थानों पर भस्म लगाये
ऊँ त्र्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे। ॐ कश्यपस्य त्रायुषमिति ग्रीवायाम्। ॐ यद्देवेषु त्रायुषमिति भुजायाम्। ऊँ तन्नो अस्तु त्रायुषमिति हृदये।

अति उत्तम व महत्वपूर्ण जानकारी के लिए हृदय से धन्यवाद
जवाब देंहटाएंआप का हृदय से आभार एवं धन्यवाद
हटाएंकृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें धन्यवाद 🙏
जवाब देंहटाएंकृपया सनातन धर्म और पद्धति को और सभी तक पहुंचाने की कृपा करें
जवाब देंहटाएं