शनिवार, 12 सितंबर 2020

विष्णु पुराण द्वितीय अध्याय

दूसरा अध्याय 

चौबीस तत्वोंके विचारके साथ जगतके उत्पत्ति क्रमका वर्णन और विष्णुको महिमा

श्रीपराशर उवाच 
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । 
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ १ 
नमो हिरण्यगर्भाय हरये शङ्कराय च । 
वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिणे ॥ २

श्रीपराशरजी बोले - जो ब्रह्मा , विष्णु और शंकररूपसे जगत् की उत्पत्ति , स्थिति और संहारके कारण है तथा अपने भक्तोंको संसार - सागरले तारने वाले हैं , उन विकाररहित , शुद्ध , अविनाशी , परमात्मा , सर्वदा एकरस , सर्वविजयी भगवान् बासुदेव विष्णुको नमस्कार है ॥ १.२ ॥

एकानेकस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः । अव्यक्तव्यक्तरूपाय विष्णवे मुक्तिहेतवे ॥ ३

 जो एक होकर भी नाना रूपवाले हैं . स्थूल सूक्ष्ममय हैं , अव्यक्त ( कारण ) एवं व्यक्त ( कार्य ) रूप है तथा [ अपने अनन्य भक्तोंकी मुक्ति के कारण है , [ उन श्रीविष्णुभगवान् को नमस्कार है ] ॥३ ॥

 सर्गस्थितिविनाशानां जगतो यो जगन्मयः । 
मूलभूतो नमस्तस्मै विष्णवे परमात्मने ॥ ४ 

 जो विश्वरूप प्रभु विश्वकी उत्पत्ति , स्थिति और संहारके मूल कारण है , उन परमात्मा विष्णुभगवान् को नमस्कार है ।॥ ४ ॥

आधारभूतं विश्वस्याप्यणीयांसमणीयसाम् । 
प्रणम्य सर्वभूतस्थमच्युतं पुरुषोत्तमम् ॥ ५ ज्ञानस्वरूपमत्यन्तनिर्मलं परमार्थतः । 
तमेवार्थस्वरूपेण भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥ ६ 
विष्णुं प्रसिष्णुं विश्वस्य स्थितौ सर्गे तथा प्रभुम् । 
प्रणम्य जगतामीशमजमक्षयमव्ययम् ॥ ७ 
कथयामि यथापूर्व दक्षायैर्मुनिसत्तमैः । 
पृष्टः प्रोवाच भगवानब्जयोनिः पितामहः ।। ८

जो विश्वके अधिष्ठान हैं , अतिसूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, सर्व प्राणियोंमें स्थित पुरुषोत्तम और अविनाशी है , जो परमार्थतः ( वास्तवमें ) अति निर्मल ज्ञानस्वरूप है , किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थरूपसे प्रतीत होते हैं , तथा जो [ कालस्वरूपसे ] जगत्की उत्पत्ति और स्थितिमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं , उन जगदीश्वर , अजन्मा , अक्षय और अव्यय भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तुम्हें वह सारा प्रसंग क्रमशः सुनाता हूँ जो दक्ष आदि मुनि श्रेष्ठोके पूछनेपर पितामह भगवान् ब्रह्माजीने उनसे कहा था।।५-८ ॥

तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदातटे । 
सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च ॥ ९ 

  वह प्रसंग दक्ष आदि मुनियोंने नर्मदा - तटपर राजा पुरुकुत्सको सुनाया था तथा पुरुकुत्सने सारस्वतसे और सारस्वतने मुझसे कहा था॥९॥

परः पराणां परमः परमात्मात्मसंस्थितः । रूपवर्णादिनिर्देशविशेषणविवर्जितः ॥ १० अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामर्धिजन्मभिः । 
वर्जितः शक्यते वक्तुं यः सदास्तीति केवलम् ॥ ११ 
सर्वत्रासो समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः । 
ततः स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥१२ 
तद्ब्रह्म परमं नित्यमजमक्षयमव्ययम् । 
एकस्वरूपं तु सदा हेयाभावाच्च निर्मलम् ॥ १३ 

जो पर ( प्रकृति ) से भी पर , परमश्रेष्ठ , अन्तरात्मामें स्थित परमात्मा , रूप , वर्ण , नाम और विशेषण आदिसे रहित है । जिसमें जन्म , वृद्धि . परिणाम , क्षय और नाश इन छः विकारोका सर्वथा अभाव है ; जिसको सर्वदा केवल है ' इतना ही कह सकते हैं , तथा जिनके लिये यह प्रसिद्ध है कि वे सर्वत्र है और उनमें समस्त विश्व बसा हुआ है - इसलिये ही विद्वान जिसको वासुदेव कहते हैं वही नित्य , अजन्मा , अक्षय , अव्यय , एकरस और हेय गुणोंके अभावके कारण निर्मल परब्रह्म है।।१०-१३ ॥

तदेव सर्वमेवैतद्व्यक्ताव्यक्तस्वरूपवत् । 
तथा पुरुषरूपेण कालरूपेण च स्थितम् ॥ १४ 

 वही इन सब व्यक्त ( कार्य ) और अव्यक्त ( कारण ) जगतके रूपसे , तथा इसके साक्षी पुरुष और महाकारण कालके रूपसे स्थित है ॥ १४ ॥

परस्य ब्रह्मणो रूपं पुरुषः प्रथमं द्विज । 
व्यक्ताव्यक्ते तथैवान्ये रूपे कालस्तथा परम् ॥ १५

 हे द्विज ! परब्रह्मका प्रथम रुप पुरुष है , अव्यक्त ( प्रकृति ) और व्यक्त ( महदादि ) उसके अन्य रूप हैं तथा [ सबको क्षोभित करनेवाला होनेसे ] काल उसका परमरूप है।॥१५ ॥

 प्रधानपुरुषव्यक्तकालानां परमं हि यत् । 
पश्यन्ति सूरयः शुद्धं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१६

 इस प्रकार जो प्रधान , पुरुष , व्यक्त और काल इन नारोंसे परे है तथा जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं वही भगवान् विष्णुक परमपद है ।। १६ ।

 प्रधानपुरुषव्यक्तकालास्तु प्रविभागशः । 
रूपाणि स्थितिसर्गान्तव्यक्तिसद्भावहेतवः ॥ १७ 

प्रधान , पुरुष , व्यक्त और काल- [ भगवान् विष्णुके ] रूप पृथक् - पृथक् संसारकी उत्पत्ति , पालन और संहारके प्रकाश तथा उत्पादन में कारण है ॥ १७ ॥

व्यक्तं विष्णुस्तथाव्यक्तं पुरुषः काल एव च । 
क्रीडतो बालकस्येव चेष्टा तस्य निशामय ॥ १८ 

भगवान् विष्णु जो व्यक्त , अव्यक्त , पुरुष और कालरूपसे स्थित होते हैं , इसे उनकी बालवत क्रीडा ही समझो ॥१८ ॥

अव्यक्त कारणं यत्तत्प्रधानमृषिसत्तमैः । 
प्रोच्यते प्रकृतिः सूक्ष्मा नित्यं सदसदात्मकम् ॥ १ ९

   उनमेंसे अव्यक्त कारणको , जो सदसद्रूप ( कारण शक्तिविशिष्ट ) और नित्य ( सदा एकरस ) है , श्रेष्ठ मुनिजन प्रधान तथा सूक्ष्म प्रकृति कहते हैं ।। १ ९ ॥

अक्षव्यं नान्यदाधारममेयमजरं ध्रुवम् । 
शब्दस्पर्शविहीन तद्रूपादिभिरसंहितम् ।। २० 

वह क्षयरहित है , उसका कोई अन्य आधार भी नहीं है तथा अप्रमेय , अजर , निश्चल शब्द - स्पर्शादिशून्य और रूपादिरहित है ॥२० ॥

त्रिगुणं तज्रगद्योनिरनादिप्रभवाप्ययम् । 
तेनाग्ने सर्वमेवासीद्ववाप्तं वै प्रलयादनु ॥ २१ 

  वह त्रिगुणमय और जगतका कारण है तथा स्वयं अनादि एवं उत्पत्ति और लयसे रहित है । यह सम्पूर्ण प्रपञ्च प्रलयकालसे लेकर सृष्टिके आदितक उसीसे व्याप्त था ॥ २१ ॥

वेदवादविदो विद्वन्नियता ब्रह्मवादिनः । 
पठति चैतमेवार्थ प्रधानप्रतिपादकम् ॥ २२ 

 हे विद्वन् ! श्रुतिके मर्मको जाननेवाले . श्रुतिपरायण ब्रह्मवेत्ता महात्मागण इसी अर्थको लक्ष्य करके प्रधानके प्रतिपादक इस ( निम्नलिखित ) श्लोकको कहा करते हैं -॥२२ ॥

नाह्ये न रात्रिर्न नभो न भूमि- 
नासीत्तमोज्योतिरभूद्य नान्यत् । 
श्रोत्रादिबुद्ध्यानुपलभ्यमेकं 
प्राधानिकं ब्रह्म पुर्मास्तदासीत् ॥ २३ 

 ' उस समय ( प्रलयकालमें ) न दिन था , न रात्रि थी , ना आकाश था , न पृथिवी थी , न अन्धकार था , न प्रकाश था और न इनके अतिरिक्त कुछ और ही था । बस , श्रोत्रादि इन्द्रियों और बुद्धि आदिका अविषय एक प्रधान ब्रह्म और पुरुष ही था ' ॥२३ ॥

विष्णोः स्वरूपात्परतो हि ते द्वे 
रूपे प्रधानं पुरुषश्च विप्र । 
तस्यैव तेऽन्येन धृते वियुक्ते 
रूपान्तरं तद् द्विज कालसंज्ञम् ॥ २४

 हे विप्र ! विष्णुके परम ( उपाधिरहित ) स्वरूपसे प्रधान और पुरुष - ये दो रूप हुए ; उसी ( विष्णु ) के जिस अन्य रूपके द्वारा वे दोनों ( सृष्टि और प्रलयकालमें ] संयुक्त और वियुक्त होते हैं , उस रूपान्तरका ही नाम ' काल ' है ॥ २४ ॥

 प्रकृतौ संस्थितं व्यक्तमतीतप्रलये तु यत् । तस्मात्प्राकृतसंज्ञोऽयमुच्यते प्रतिसञ्चरः ॥ २५

 बीते हुए प्रलयकालमें यह व्यक्त प्रपञ्च प्रकृतिमें लीन था , इसलिये प्रपञ्चके इस प्रलयको प्राकृत प्रलय कहते है॥२५॥ 

 अनादिभंगवान्कालो नान्तोऽस्य द्विज विद्यते । अव्युच्छिन्नास्ततस्त्वेते सर्गस्थित्यत्तसंयमाः ॥ २६ 

हे द्विज ! कालरूप भगवान अनादि हैं , इनका अन्त नहीं है इसलिये संसारको उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय भी कभी नहीं रुकते [ वे प्रवातरूपसे निरन्तर होते रहते हैं ॥२६ ॥

गुणसाम्ये ततस्तस्मिन्पृथक्युसि व्यवस्थिते । 
कालस्वरूप तद्विष्णोमैत्रेय परिवर्तते ।। २७ 

 है मैत्रेय ! प्रलयकालमें प्रधान ( प्रकृति ) के साम्यावस्थामे स्थित हो जानेपर और पुरुपके प्रकृतिसे पृथक् स्थित हो जानेपर विष्णुभगवान् का कालरूप [ इन दोनोंको धारण करने के लिये प्रवृत्त होता है ॥२७ ॥

ततस्तु तत्परं ब्रहा परमात्मा जगन्मयः । 
सर्वगः सर्वभूतेश : सर्वात्मा परमेश्वरः ॥ २८ 
प्रधानपुरुषौ चापि  अविश्यात्मेछया हरिः । 
क्षोभयामास सम्प्राप्ते सर्गकाले व्ययाव्ययौ ॥ २ ९ 

तदनन्तर [ सर्गकाल उपस्थित होनेपर ] उन परब्रह परमात्मा विश्वरूप सर्वव्यापी सर्वभूतेश्वर सर्वात्मा परमेश्वरने अपनी इच्छासे विकारी प्रधान और अविकारी पुरुष प्रविष्ट होकर उनको क्षोभित किया ॥ २८-२९ ।।

यथा सन्निधिमात्रेण गन्धः क्षोभाय जायते । 
मनसो नोपकर्तृत्वात्तथाऽसौ परमेश्वरः ॥ ३० 

  जिस प्रकार क्रियाशील न होनेपर भी गन्ध अपनी सन्निधिमात्रसे ही मनको क्षुभित कर देता है उसी प्रकार परमेश्वर अपनी सन्निधिमात्रसे ही प्रधान और पुरुषको प्रेरित करते हैं ॥ ३० ॥ 

स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश्च पुरुषोत्तमः । ससङ्कोचविकासाभ्यांप्रधानत्येऽपि च स्थितः ॥ ३१

हे ब्रह्मन् ! वह पुरुषोत्तम ही इनको क्षोभित करनेवाले हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा संकोच ( साम्य ) और विकास ( क्षोभ ) युक्त प्रधानरूपसे भी ये ही स्थित है ॥३१ ॥

 विकासाणुस्वरूपैश्च ब्रह्मरूपादिभिस्तथा । 
व्यक्तस्वरूपश्च तथा विष्णुः सर्वेश्चरेश्वरः ।। ३२

 क्रमादि समस्त ईश्वरोंके ईश्वर के विष्णु ही समष्टि - व्यष्टिरूप , ब्रह्मादि जीवरूप तथा महत्तत्त्वरूपसे स्थित हैं ॥ ३२ 

गुणसाम्यात्ततस्वस्मारक्षेत्रज्ञाधिष्ठितान्मुने । गुणव्यञ्जनसम्भूतिः सर्गकाले द्विजोत्तम ॥ ३३

 हे द्विजश्रेष्ठ ! सर्गकालके प्राप्त होनेपर गुणोंको साम्यावस्थारूप प्रधान जय विष्णुके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुआ तो उससे महतत्त्व की उत्पत्ति हुई ॥ ३३

 प्रधानतत्त्वमुद्भूतं महान्तं तत्समावृणोत् ।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान् ॥ ३४ 
प्रधानतत्त्वेन समं त्वचा बीजमिवावृतम् । 
वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः ॥ ३५ त्रिविधोऽयमहङ्कारो महत्तत्वादजायत । 
भूतेन्द्रियाणां हेतुस्स त्रिगुणत्वान्महामुने । 
यथा प्रधानेन महान्महता स तथावृतः ॥ ३६ 

 उत्पन्न हुए महान् को प्रधानतत्व ने आवृत किया ; महत्तत्त्व सात्विक , राजस और तामस , भेदसे तीन प्रकारका है । किन्तु जिस प्रकार बीज छिलके से समभावसे ढंका रहता है वैसे ही यह त्रिविध महत्तत्व प्रधान - तत्वसे सब ओर व्याप्त है । फिर त्रिविध महत्तत्त्वसे ही वैकारिक ( सात्त्विक ) तेजस ( राजस ) और तामस भूतादि तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ । हे महामुने ! यह त्रिगुणात्मक होनेसे भूत और इन्द्रिय आदिका कारण है और प्रधानसे जैसे महतत्व व्याप्य है , वैसे ही महतत्वसे वह ( अहंकार ) व्याप्त है । ३४-३६

भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः । 
ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम् ॥ ३७ 

भूतादि नामक तामस अहंकारने विकृत होकर शब्द - तन्मात्रा और उससे शब्द - गुणवाले आकाशको रचना की ॥ ३७ ।।

शब्दयात्रं तथाकाशं भूतादिः ससमावृणोत् । 
आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ॥ ३८

उस भूतादि तामस अहंकार ने शब्द - तन्मात्रारूप आकाशको व्याप्त किया । फिर [ राद्ध - तन्मात्रारूप ] आकाशने विकृत होकर स्पर्श - तन्मात्राको रचा ॥३८ ॥

बलवानभ्रवद्वायुस्तस्य स्पशों गुणो मतः । 
आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत् ॥ ३ ९ 

उस ( स्पर्श - तन्मात्रा ) से बलवान् वायु हुआ.उसका गुण स्पर्श माना गया है । शब्द तन्मात्रारूप आकाशने स्पर्श - तमात्रावाले वायुको आवृत किया है ॥३ ९ ॥

ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्र ससर्ज ह। 
ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ ४० 

फिर ( स्पर्श - तन्मात्रारूप ] वायुने विकृत होकर रूप - तन्मात्राकी सृष्टि की । ( रूप - तन्मात्रायुक्त ) वायुसे तेज उत्पन्न हुआ हैं , उसका गुण रूप कहा जाता है ॥ ४०॥ 

स्पर्शमात्रं तु वै वायू रूपपात्रं समावृणोत् । 
ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमा ससर्ज ह ॥ ४१ 

 स्पर्श - तन्मात्रारूप वायुने रूप - तन्मात्रायाले तेजको आवृत किया । फिर ( रूप - तन्मात्रामय ] तेजने भी विकृत होकर रस - तन्मात्राकी रचना की ।। ४१ ॥

सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि च । 
रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्र समावृणोत् ।। ४२

 उस ( रस तन्मात्रारूप ) से रस - गुणवाला जल हुआ । रस - तन्मात्रावाले जलको रूप - तन्मात्रामय तेजने आवृत किया ॥ ४२ ॥

 विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससजिरे । 
सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः ।। ४३

 [ रस तन्मात्रारूप ) जलने विकारको प्राप्त होकर गन्ध - तन्मात्राकी सृष्टि की , उससे पृथिवी उत्पन्न हुई है जिसका गुण गन्ध माना जाता है । ४३ ॥

 तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता ॥ ४४

 उन - उन आकाशादि भूतोंने तन्मात्रा है [ अर्थात् केवल उनके गुण शब्दादि ही हैं ] इसलिये वे तन्मात्रा ( गुणरूप ) ही कहे गये है ॥४४ ॥

 तन्मात्राण्यविशेषाणि अविशेषास्ततो हि ते ॥ ४५ 

तन्मात्राओ में विशेष भाव नहीं है इसलिये उनकी अविशेष संज्ञा है ।॥ ४५ ॥

न शान्ता नापि घोरास्ते न मूढाश्चाविशेषिणः । भूततन्मात्रसर्गोऽयमहङ्कारात्तु तामसात् ॥ ४६

  वे अविशेष तन्मात्राएँ शान्त , घोर अथवा मूढ़ नहीं है [ अर्थात् उनका सुख - दुःख या मोहरूपसे अनुभव नहीं हो सकता ] इस प्रकार तामस अहंकारसे यह भूत तन्मात्रारूप सर्गः हुआ ॥४६ ॥

 तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश । 
एकादशं मनश्चात्र देवा वैकारिकाः स्मृताः ॥ ४७

दस इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारसे और उनके अधिष्ठाता देवता वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए कहे जाते हैं । इस प्रकार इन्द्रियोंके अधिष्ठाता दस देवता और ग्यारहवाँ मन वैकारिक ( सात्विक ) हैं।।४७ ॥

त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमत्र च पञ्चमम् । शब्दादीनामवाप्त्यर्थ बुद्धियुक्तानि वै द्विज ।। ४८ 

 हे द्विज ! त्वक् , चक्षु , नासिका , जिला और श्रोत्र - ये पाँचों बुद्धिकी सहायतासे शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है ॥४८ ॥

पायूपस्थौ करौ पादौ वाक् च मैत्रेय पञ्चमी । विसर्गशिल्पगत्युक्ति कर्म तेषां च कथ्यते ॥ ४ ९

 हे मैत्रेय ! पायु ( गुदा ) , उपस्थ ( लिङ्ग ) , हस्त , पाद और वाक् - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । इनके कर्म [ मल - मूत्रका ] त्याग , शिल्प , गति और वचन बतलाये जाते हैं ॥४ ९ ॥

आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा । शब्दादिभिर्गुणैर्ब्रह्मन्संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५०

आकाश , वायु , तेज , जल और पृथिवी - ये पांचों भूत उत्तरोत्तर ( क्रमशः ) शब्द - स्पर्श आदि पाँच गुणोंसे युक्त हैं ॥ ५० ॥

 शान्ताघोराश्चमूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ॥ ५१ 

 ये पाँचों भूत शान्त घोर और मूढ हैं [ अर्थात् सुख , दुःख और मोहयुक्त है । अतः ये विशेष कहलाते हैं ||५१||

नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहति विना । 
नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्रशः ॥ ५२

 इन भूतोंमें पृथक् - पृथक् नाना शक्तियाँ हैं । अतः वे परस्पर पूर्णतया मिले बिना संसारकी रचना नहीं कर सके ।। ५२ ।।

 समेत्यान्योन्यसंयोग परस्परसमाश्रयाः । 
एकसङ्घातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५३ पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च । 
महदाद्या विशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति ते ।। ५४ 

इसलिये एक दूसरेके आश्रय रहनेवाले और एक ही संघातकी उत्पत्तिके लक्ष्यवाले महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त प्रकृति के इन सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रधान तत्त्वके अनुग्रहसे अण्ड की उत्पत्ति की ॥५३-५४ ॥


तत्क्रमेण विवृद्धं सज्जलबुद्बुदवत्समम् । 
भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे महत्तदुदकेशयम् । 
प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ।। ५५

  हे महायुद्ध ! जलके खुलपुलेके समान क्रमशः भूतोंसे बढ़ा हुआ वह गोलाकार और जलपर स्थित महान् अण्ड ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) रूप विष्णुका अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ ॥ ५५॥

 तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ व्यक्तरूपो जगत्पतिः । विष्णुब्रह्मस्वरूपेण स्वयमेव व्यवस्थितः ।। ५६

 उसमें वे अव्यक्त - स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भरूपसे स्वयंही विराजमान हुए ॥५६॥

 मेरुरूल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः । 
गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन्सुमहात्मनः ॥ ५७

उन महात्मा हिरण्यगर्भका सुमेरु उल्ब ( गर्भको ढ़ाकनेवाली झिल्ली ) , अन्य पर्वत , जरायु ( गर्भाशय ) तथा समुद्र गर्भाशयस्थ रस था ।५७ ॥

 साद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः । तस्मिन्नण्डेऽभवद्विप्र सदेवासुरमानुषः ॥ ५८

 हे विप्र ! उस अण्डमें ही पर्वत और द्वीपादिके सहित समुद्र मह - गणके सहित सम्पूर्ण लोक तथा देव , असुर और मनुष्य आदि विविध प्राणिवर्ग प्रकट हुए । ५८ ॥

 वारिवहन्यनिलाकाशैस्ततो भूतादिना बहिः । 
वृतं दशगुणैरण्डं भूतादिर्महता तथा ।। ५ ९ 

 वह अण्ड पूर्व - पूर्वकी अपेक्षा दस - दस - गुण अधिक जल , अग्नि , वायु , आवश और भूतादि अर्थात् तामस - अहंकारसे आवृत है तथा भूतादि महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है ।। ५९ ।।

अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मस्तैः सर्वैः सहितो महान् । 
एभिरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् । नारिकेलफलस्यान्तर्बीज बाह्यदलैरिव ॥६० 

और इन सबके सहित वह महत्तत्त्व भो अव्यक्त प्रधानसे आवृत है । इस प्रकार जैसे नारियलके फलका भीतरी बीज बाहरसे कितने ही छिलकोंसे ढ़ंका रहता है वैसे ही यह अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे घिरा हुआ है ।६० ॥

जुषन् रजो गुणं तत्र स्वयं विश्वेश्वरो हरिः । 
ब्रह्मा भूत्वास्य जगतो विसृष्टौ सम्प्रवर्तते ॥ ६१

  उसमें स्थित हुए स्वयं विश्वेश्वर भगवान् विष्णु ब्रह्मा होकर रजोगुणका आश्रय लेकर इस संसारकी रचनामे प्रवृत्त होते हैं ।६१ ॥

सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना । सत्त्वभृद्भगवान्विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥६२ 

तथा रचना हो जानेपर सत्वगुण - विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान् विष्णु उसका कल्पान्तपर्यन्त युग - युगमे पालन करते हैं । ६२ ।

तमोद्रेकी च कल्पान्ते रूबरूपी जनार्दनः । 
मैत्रेयाखिलभूतानि भक्षयत्यतिदारुणः ॥ ६३ 

  हे मैत्रेय ! फिर कल्पका अन्त होनेपर अति दारुण तमः प्रधान रुद्ररूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतोका भक्षण कर लेते है ॥६३ ॥

भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येकार्णवीकृते । 
नागपर्सङकशयने शेते च परमेश्वरः ॥ ६४ 

 इस प्रकार समस्त भूतोंका भक्षण कर संसारको जलमय करके वे परमेश्वर शेष - शय्यापर शयन करते हैं ॥६४ ॥

प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टिं करोति ब्रह्मरूपधृक् ।। ६५

जगनेपर ब्रह्मारूप होकर वे फिर जगत्की रचना करते हैं ॥६५॥

 सृष्टिस्थित्यन्तकरणी ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् । 
स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ ६६ 

 वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत्की सृष्टि , स्थिति और संहारके लिये ब्रह्मा , विष्णु और शिव - इन तीन संज्ञाओंको धारण करते हैं ।। ६६ ।।

स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यंचपातिच । 
उपसंहियते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः ॥ ६७ 

 वे प्रभु विष्णु स्रष्टा ( ब्रह्मा ) होकर अपनी ही सृष्टि करते हैं , पालक विष्णु होकर पाल्यरूप अपना ही पालन करते हैं और अन्तमें स्वयं ही संहारक ( शिव ) तथा स्वयं ही उपसंहृत ( लीन ) होते हैं ।६७ ॥

पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च । 
सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषारख्यं हि यज्जगत् ॥ ६८ 
स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोऽव्ययः । 
सर्गादिकं तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम् ।। ६ ९ 

पृथिवी , जल , तेज , वायु और आकाश तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि जितना जगत् है सब पुरुषरूप है और क्योंकि वह अव्यय विष्णु ही विश्वरूप और सब भूतोंके अन्तरात्मा है , इसलिये ब्रह्मादि प्राणियों में स्थित सर्गादिक भी उन्हीं के उपकारक है । [ अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजों द्वारा किया हुआ हवन यजमानका उपकारक होता है , उसी तरह परमात्माके रचे हुए समस्त प्राणियोंद्वारा होनेवाली सृष्टि भी उन्हीं की उपकारक है ] || ६८-६९ ।

स एव सृज्यः सच सर्गकर्ता 
स एव पात्यत्ति च पाल्यते च ।। 
ब्रह्माद्यवस्थाभिरशेषमूर्ति 
विष्णुर्वरिष्ठो वरदो वरेण्यः ।। ७०

  वे सर्वस्वरूप , श्रेष्ठ , वरदायक और वरेण्य ( प्रार्थनाके योग्य ) भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा आदि अवस्थाद्वारा रचनेवाले है , वे ही रचे जाते हैं , वे ही पालते हैं , वे ही पालित होते हैं तथा वे ही संहार करते है [ और स्वयं ही संहृत होते हैं ] ७० ।।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

विष्णु पुराण

श्रीमनारायणाय नमः 

श्रीविष्णुपुराण 

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । 
देवी सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। 

पहला अध्याय 


श्रीसूत उवाच 

ॐ पराशर मुनिवर कृतपौर्वाहिकक्रियम् । 
मैत्रेयः परिपप्रच्छ प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥१ 

श्रीसूतजी बोले - मैत्रेयजीने नित्यकर्मोसे निवृत्त हुए मुनिवर पराशरजीको प्रणाम कर एवं उनके चरण छूकर पूछा -॥१ ॥

त्वत्तो हि वेदाध्ययनमधीतमखिलं गुरो । 
धर्मशास्त्राणि सर्वाणि तथाङ्गानि यथाक्रमम् ॥२

 " हे गुरुदेव ! मैंने आपहीसे सम्पूर्ण वेद , वेदाङ्ग और सकल धर्मशास्त्रोका क्रमशः अध्ययन किया है॥२॥

स्वलासादायुनिश्रेष्ठ मामन्ये नाकृतश्रमम् । 
वक्ष्यक्ति सर्वशालोषु प्रायशो येऽपि विहिवः ॥३

हे मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मेरे विपक्षी भी मेरे | लिये यह नहीं कह सकेंगे कि ' मैंने सम्पूर्ण शास्रोंके अभ्यासमें परिश्रम नहीं किया ॥३ ॥ 

सोऽहमिच्छामि धर्मज्ञ श्रोतुं त्वत्तो यथा जगत् । 
बभूव भूयश्च यथा महाभाग भविष्यति ॥४ 

हे धर्मज्ञ हे महाभाग ! अब मैं आपके मुखारविन्दसे यह सुनना चाहता हूँ कि यह जगत् किस प्रकार उत्पत्र हुआ और आगे भी ( दूसरे कल्पके आरम्भमें ) कैसे होगा ? ॥४ ॥

यन्पर्य जगब्रह्मन्यत तचराचरम् । 
लीनमासीग्रथा यत्र लयमेष्यति यत्र च ॥५ 

तथा हे ब्रह्मन् ! इस संसारका उपादान - कारण क्या है ? यह सम्पूर्ण चराचर किससे उत्पन्न हुआ है ? यह पहले किसमें लीन था और आगे किसमे लीन हो जायगा ? ॥५ 

यतामाणानि भूतानि देवादीनां च सम्भवम् । 
समुद्रपर्वतानां च संस्थानं च यथा भुवः ॥ ६
सूर्यादीनां च संस्थानं प्रमाणं मुनिसत्तम । 
देवादीनां तथा वंशाधनूमन्वन्तराणि च ।। ७ 
कल्पान् कल्पविभागांश चातुर्युगविकल्पिता । 
कल्पान्तस्य स्वमार्य च युगधर्माच कृत्वशः ॥८
देवर्षिपार्थिवानां च चरितं यन्महामुने । 
वेदशाखाप्रणयनं यथावयासकर्तृकम् ॥ ९ 
धर्माश्च ब्राह्मणादीनां तथा चाश्रमवासिनाम् । 
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं त्वत्तो वासिष्ठनन्दन ॥ १०

इसके अतिरिक्त [ आकाश आदि ) भूतोका परिमाण , समुद्र , पर्वत तथा देवता आदिको उत्पत्ति , पृथिवीका अधिष्ठान और सूर्य आदिका परिमण तथा उनका आधार , देवता आदिके वंश , मनु , मन्यन्तर , ( बार - बार आनेवाले ] चारों युगोंमें विभक्त कल्प और कल्पोंक विभाग , प्रलयका स्वरूप , युगों के पृथक् - पृथक् सम्पूर्ण धर्म , देवर्षि और राजर्षियोंके चरित्र , श्रीव्यासजीकृत वैदिक शाखाओंकी यथावत् रचना तथा ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंके धर्म - ये सब , हे महामुनि शक्तिनन्दन ! मैं आपसे सुनना चाहता हूँ ।। ६-१० ॥ 

 ब्रह्मन्प्रसादप्रवणं कुरुन पयि मानसम् । 
येनाहमेतज्जानीयां त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ ११

  हे ब्रह्मन् ! आप मेरे प्रति अपना चित्त प्रसादोन्मुख कीजिये जिससे हे महामुने ! मैं आपकी कृपासे यह सब जान सकूँ " ।। ११ ।।

श्रीपराशर उवाच 
साधु मैत्रेय धर्मज्ञ स्मारितोऽस्मि पुरातनम् । 
पितुः पिता मे भगवान् वसिष्ठो यदुवाच ह ॥ १२

श्रीपराशरजी बोले- “ हे धर्मज्ञ मैत्रेय ! मेरे पिताजीके पिता श्रीवसिष्ठजीने जिसका वर्णन किया था , उस पूर्व प्रसङ्गका तुमने मुझे अच्छा स्मरण कराया [ इसके लिये तुम धन्यवादके पात्र हो ] ॥ १२ ॥ 

 विश्वामित्रप्रयुक्तेन रक्षसा भक्षितः पुरा ।। 
श्रुतस्तातस्ततः क्रोधो मैत्रेयाभून्ममातुलः ॥ १३ 

हे मैत्रेय ! जब मैंने सुना कि पिताजीको विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसने खा लिया है , तो मुझको बड़ा भारी क्रोध हुआ ॥ १३ ॥ 

ततोऽहं रक्षसां सत्रं विनाशाय समारभम् । 
भस्मीभूताश्च शतशस्तस्मिन्सत्रे निशाचराः ।। १४ 

तब राक्षसोंका ध्वंस करनेके लिये मैंने यज्ञ करना आरम्भ किया । उस यज्ञमें सैकड़ों राक्षस जलकर भस्म हो गये ॥ १४ ॥ 

ततः सङ्क्षीयमाणेषु तेषु रक्षस्स्वशेषतः । 
मामुवाच महाभागो वसिष्ठो मत्पितामहः ॥ १५

इस प्रकार उन राक्षसोंको सर्वथा नष्ट होते देख मेरे महाभाग पितामह वसिष्ठजी मुझसे बोले- ॥ १५॥

 अलमत्यन्तकोपेन तात मन्युमिमं जहि । 
राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहितं हि तत् ।। १६ 

हे वत्स ! अत्यन्त क्रोध करना ठोक नहीं , अब इसे शान्त करो । राक्षसोका कुछ भी अपराध नहीं है , तुम्हारे पिताके लिये तो ऐसा ही होना था ।। १६ ॥ 

मूढानामेव भवति क्रोधो ज्ञानवतां कुतः । 
हन्यते तात कः केन यतः स्वकृतभुक्पुमान् ।। १७

क्रोध तो मूखोंको ही हुआ करता है , विचारवानोंको भला कैसे हो सकता है ? भैया ! भला कौन किसीको मारता | है ? पुरुष स्वयं ही अपने कियेका फल भोगता है ॥ १७ ॥

 सञ्चितस्यापि महता वत्स क्लेशेन मानवैः । 
यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः परः ।। १८

हे प्रियवर ! यह क्रोध तो मनुष्यके अत्यन्त कष्टसे | सञ्चित यश और तपका भी प्रबल नाशक है ॥ १८॥ 

 स्वर्गापवर्गव्यासेधकारणं परमर्षयः ।
वर्जयन्ति सदा क्रोधं तात मा तद्वशो भव ॥ १ ९ 

हे | तात ! इस लोक और परलोक दोनोको बिगाड़नेवाले इस क्रोधका महर्षिगण सर्वदा त्याग करते हैं , इसलिये तू | इसके वशीभूत मत हो ॥ १ ९ ॥ 

अलं निशाचरैर्दग्यैर्दनिरनपकारिभिः । 
सत्रं ते विरमत्वेतत्क्षमासारा हि साधवः ॥ २० 

अब इन बेचारे निरपराध राक्षसोंको दग्ध करनेसे कोई लाभ नहीं अपने इस यज्ञको समाप्त करो । साधुओंका धन तो सदा क्षमा ही है " ॥२० ॥ 

एवं तातेन तेनाहमनुनीतो महात्मना । 
उपसंहृतवान्सत्रं सद्यस्तद्वाक्यगौरवात् ॥ २१ 

महात्मा दादाजीके इस प्रकार समझानेपर उनकी बातोंके गौरवका विचार करके मैने वह यज्ञ समाप्त कर | दिया ॥ २१॥ 

ततः प्रीतः स भगवान्वसिष्ठो मुनिसत्तमः । 
सम्प्राप्तश्च तदा तत्र पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः ॥ २२ 

इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठजी बहुत | प्रसन्न हुए । उसी समय ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यजी वहाँ आये ॥ २२॥

पितामहेन दत्तार्घ्यः कृतासनपरिग्रहः । 
मामुवाच महाभागो मैत्रेय पुलहाग्रजः ।। २३ 

हे मैत्रेय ! पितामह [ वसिष्ठजी ] ने उन्हें | अर्घ्य दिया , तब वे महर्षि पुलहके ज्येष्ठ भ्राता महाभाग | पुलस्त्यजी आसन ग्रहण करके मुझसे बोले ॥ २३ ॥

पुलस्त्य उवाच 

वैरे महति यद्वाक्याद्गुरोरद्याश्रिता क्षमा । 
त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्छास्त्राणि वेत्स्यति ॥ २४

पुलस्त्यजी बोले - तुमने , चित्तमें बड़ा वैरभाव रहनेपर भी अपने बड़े - बूढे वसिष्ठजीके कहनेसे क्षमा स्वीकार की है  इसलिये तुम सम्पूर्ण शास्त्रो के ज्ञाता होगे ॥२४ ॥

 सन्ततेर्न ममोच्छेदः कुद्धेनापि यतः कृतः । 
त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्यन्यं महावरम् ।। २५

 हे महाभाग ! अत्यन्त क्रोधित होनेपर भी तुमने मेरी सन्तानका सर्वथा मूलोच्छेद नहीं किया ; अतः मैं तुम्हें एक और उत्तम वर देता हूँ ॥ २५ ॥

 पुराणसंहिताकर्ता भवान्वत्स भविष्यति । 
देवतापारमार्थ्यं च यथावद्वेत्स्यते भवान् ॥ २६ 

हे वत्स ! तुम पुराणसंहिताके वक्ता होगे और देवताओंके यथार्थ स्वरूपको जानोगे ॥ २६ ॥

प्रवृत्ते च निवृत्ते च कर्मण्यस्तमला मतिः । मत्प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति ॥ २७ 

 तथा मेरे प्रसादसे तुम्हारी निर्मल बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति ( भोग और मोक्ष ) के उत्पन्न करनेवाले कर्मोंमें निःसन्देह हो जायगी ।। २७ ।।

ततश्च प्राह भगवान्वसिष्ठो मे पितामहः । 
पुलस्त्येन यदुक्तं ते सर्वमेतद्भविष्यति ॥ २८ 

 [ पुलस्त्यजीके इस तरह करनेके अनन्तर ] फिर मेरे पितामह भगवान् वसिष्ठजी बोले “ पुलस्त्यजीने जो कुछ कहा है , वह सभी सत्य होगा " || २८ ॥

इति पूर्व वसिष्ठेन पुलस्त्येन च धीमता । 
यदुक्तं तत्स्मृतिं याति त्वताश्नादखिलं मम ॥ २ ९ 

 हे मैत्रेय ! इस प्रकार पूर्वकालमें बुद्धिमान् वसिष्ठजो और पुलस्त्यजीने जो कुछ कहा था , वह सब तुम्हारे प्रश्न से मुझे स्मरण हो आया है ।। २ ९ ॥

सोऽहं वदाम्यशेषं ते मैत्रेय परिपृच्छते । 
पुराणसंहितां सम्यक् तां निबोध यथातथम् ॥ ३० 

 अतः हे गैत्रेय ! तुम्हारे पूछनेसे मैं उस सम्पूर्ण पुराणसंहिताको तुम्हे सुनाता हूँ : तुम उसे भली प्रकार ध्यान देकर सुनो ॥ ३०

विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम् । स्थितिसंयमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः ॥३१

 यह जगत् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है , उन्होंमें स्थित है , वे ही इसकी स्थिति और लयके ता है तथा यह जगत् भी वे ही है ॥३१ ॥

शनिवार, 5 सितंबर 2020

सूर्य नमस्कार

        
                     
  
    

                             सूर्य के बारह नमस्कार 

सूर्य की पूजा और वन्दना भी नित्य कर्ममें आती है।  शास्त्रों में इसका बहुत महत्व बताया गया है।  एक दिन की सूर्य पूजा का फल दूध देने वाले एक लाख गायों के दान के फल से भी अधिक होता है।  पूजा की तरह, सूर्य नमस्कार भी महत्वपूर्ण है।  सूर्य के बारह नामों से बारह नमस्कार की विधि यहाँ दी गई है। प्रणामों मे साष्टांग प्रणाम को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।  यह अधिक उपयोगी है।  इससे शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है।  भगवान सूर्य के एक नाम का उच्चारण करके साष्टांग प्रणाम करें।  फिर उठकर दुसरा नाम बोल कर और एक दण्डवत् करें।  इस तरह से बारह साष्टांग प्रणाम किया जाता है।  जल्दी मत करें, श्रद्धाभक्ति से करें।  

एतदर्थ प्रथम सूर्यमंडल में सौंदर्यराशि भगवान नारायण का ध्यान करना चाहिए।  दोनों हाथों को भावना के साथ भगवान के कोमल चरणों को स्पर्श करें, ललाट भी उसी सुखस्पर्श में केंद्रित होने दें और आंखें उनके सौन्दर्य पान में मत्त हों |

संकल्प - ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: अद्य....अहं श्रीपरमात्मा प्रीतिर्थमादित्यस्य द्वादशनमस्काराख्यम् कर्म करिष्ये।  

संकल्प के बाद,अञ्जलि में या ताम्रपात्र में लाल चंदन, अक्षत, फूल डालकर हाथों को हृदय के पास लाकर  निम्नलिखित मंत्र के साथ सूर्य को अर्घ्य दें।  

१ प्रातः संध्यावसाने तु नित्यं सूर्यं समर्चयेत्
(पारिजात) 

२- प्रदद्याद् वै गवां लक्षं दोग्ध्रीणां वेदपरागे।  
एकाहमर्चयेद् भानुं तस्य पुण्यं ततोऽधिकम् || (भाविष्यपुराण) 

३- यः सूर्य पूजयेनित्यम् प्रणमेद् वापि भक्तितः।  
तस्य योगं च मोक्षं च ब्रध्नस्तुष्टः प्रयच्छति ||  
(भविष्य पुराण)

एहि सूर्य ! सहस्रांशो ! तेजोराशे ! जगत्पते ! 
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाऱ्या दिवाकर ! 

अब सूर्यमण्डलमें स्थित भगवान् नारायणका ध्यान करे 

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती 
नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः । 
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी
 हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥ 

अब उपर्युक्त विधिसे ध्यान करते हुए निम्नलिखित नाम - मन्त्रोंसे भगवान् सूर्यको साष्टाङ्ग प्रणाम करे 
( १ ) ॐ मित्राय नमः । 
( २ ) ॐ रवये नमः । 
( ३ ) ॐ पूर्याय नमः । 
( ४ ) ॐ भानवे नमः । 
( ५ ) ॐ खगाय नमः । 
( ६ ) ॐ पूष्णो नमः । 
( ७ ) ॐ हिरण्यगर्भाय नमः । 
( ८ ) ॐ परीचये नमः । 
( ९ ) ॐ आदित्याय नमः । 
( १० ) ॐ सवित्रे नमः । 
( ११ ) ॐ अर्काय नमः । 
( १२ ) ॐ भास्कराय नमो नमः । 

इसके बाद सूर्यके सारथि अरुणको अर्घ्य दे 

विनतातनयो देवः कर्मसाक्षी सुरेश्वरः । 
सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च अरुणो मे प्रसीदतु ॥ 
ॐ कर्मसाक्षिणे अरुणाय नमः |
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने । 
जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्यं नोपजायते ॥

 - इसके बाद सूर्यार्घ्य का जल मस्तक और आँखों में लगाये तथा कुछ चरणामृत निम्नलिखित मन्त्रसे पी लें | 

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । 
सूर्यपादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम् ॥ 
ॐ तत्सत् कृतमिदं कर्म ब्रह्मार्पणमस्तु । 
विष्णवे नमः , विष्णवे नमः , विष्णवे नमः ।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

संध्योपासन

मध्याह्न - संध्या 
(प्रात: - संध्याके अनुसार करे)
 प्राणमयके बाद 'ऊँ सूर्यश्च मेति' के विनियोग और आचमन - मन्त्रके स्थानपर नीचे लिखे विनियोग और मन्त्र पढ़े। 
विनियोग
ऊँ आपः पुनन्त्विति ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः आपो  देवता अपामुपस्पर्शेन विनियोगः।
आचमन -
ॐ आप: पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्।  पुन्नतु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपुता पुनातु माम्।  यदुच्छिष्टमभोज्यं  च यद्वा दुश्चरितं मम |  
सर्व पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहँ स्वाहा।  
(तै आ ० प्र ० १०, अ ० २३३) 
उपस्थान - 
चित्रके अनुसार दोनों हाथ ऊपर करे।  
अर्घ्य - 
सीधे खड़े होकर सूर्यको एक अर्घ्य दे। 
 विष्णुरूपा गायत्रीका ध्यान
ॐ मध्याह्ने विष्णुरूपां च तार्क्ष्यस्थां पीतवाससाम्
युवतीं यजुर्वेदां सूर्यमण्डलसंस्थिताम् |
सौर मंडल में स्थित युवावस्था वाली पीला वस्त्र, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए गरीब पर बैठी हुई यजुर्वेदस्वरूपा गायत्री का ध्यान करें।

1 - शायं अग्निश्च में त्युक्त्वा प्रातः सूर्येत्यपः पिबेत् |आप: पुनन्तु मध्याह्ने ततश्चाचमनं चरेत् ||
 (भारद्वाज, ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्यसंहिता)  


                       शायं - संध्या
 (प्रातः - संध्या  के अनुसार करें) 
उत्तराभिमुख हो सूर्य के रहते सबसे उत्तम है।  
प्राणायाम के बाद  'ऊँ सूर्यश्च मेति०' के विनियोग तथा आचमन मंत्र के स्थान पर नीचे लिखा विनियोग और मंत्र का पढ़कर आचमन  करें | 
विनियोग  -  अग्निश्च मेति रुद्र ऋषिः प्रकृतिश्छंदोग्निर्देवता आपामुपस्पर्शने विनियोगः।  

आचमन -
ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च  मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम् |  यदह्रा पापमकार्ष  मनसा वाचा हस्ताभ्यां  पद्भ्यामुदरेण  शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु।  यत्किंच दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ  सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा।  
(तै आ प १० २४ २४) 

अर्घ्य - 
पश्चिम की ओर मुख करके बैठे हुए तीन अर्घ दें।  |  
५ ९ २] नी ० कर्म पु ० ४]  

उपस्थान
चित्र के अनुसार दोनों हाथ बंदकर से कमल के सदृश करें।


शिवरूपा गायत्री ध्यान  
 सायाह्ने शिवरूपां च वृद्धां वृषभवाहिनीम्।  सूर्यमण्डलमध्यस्थां सामवेदसमायुताम् ||
 
सूर्य मंडल में स्थित वृद्धारूपा त्रिशूल, डमरू, पाश तथा  पात्र लिए वृषभ पर बैठी हुई सामवेदस्वरूपा गायत्री का ध्यान करें। 
 आशौच में संध्योपासन विधि
महर्षि पुलस्त्य ने जननाशौच एवं मरणाशौच में संध्योपासन की अबाधित आवश्यकता बताई गई है।  लेकिन अशौच में, प्रक्रिया भिन्न हो जाती है ।  शास्त्रों ने इसमें मानसी संध्याका विधान किया है।  इसमें उपस्थान नही हो जाता है।  यह संध्या  की आरम्भ से, सूर्य के अर्घ्य तक ही सीमित रहती है।  यहां गायत्री का दस बार जप करना आवश्यक है। इतने से संध्योपासन का फल प्राप्त होता है।  एक मत यह है कि इसमें कुश और जलका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।  निर्णीतमत यह है कि बिना मन्त्र पढ़े प्राणायाम करें। मार्जन मत्रों काे मन में ही पढ़कर मार्जन करें|  गायत्री का सम्यक उच्चारण कर सूर्य को अर्घ्य दें। तथा पैठीनसि के अनुसार सूर्य को जलाञ्जलि देकर प्रदक्षिणा और नमस्कार करें। आत्पति के समय रास्ते में और यहां तक ​​कि अशक्त होने पर मानसी संध्या भी की जाती है।

१ संध्यामिस्टं च होमं च यावज्जीवं समाचरेत्।  
न त्यजेत् सूतके वापि त्यजन् गच्छत्यधोगतिम् ||
२ सूतके मानसीं संध्यां कुर्याद् वै  सुप्रयत्नतः।  (स्मृतिसमुच्चय) 
३ - उपस्थानम न चैव हि।  (भारद्वाज, आचार भूषण) 
४ - अर्घ्यान्ता मानसी संध्या।  (निर्णयसिंधु) 
५- गायत्री दशधा जपत्वा संध्यायाः फलमाप्नुयात्।  
(स्मृति समुच्चय)
६ कुशवारीे विवर्जिता।  (निर्णयसिन्धु) 
७ सुतके  मृतके कुर्यात् प्राणायामममंत्रकम् तथा मार्जनमन्त्रस्तु मनसोच्चचार्य मार्जयेत्।  गायत्री सम्यगुच्चार्य सूर्यायार्घ्य निवेदयेत्।  मार्जनम् तु वा कार्यमुपस्थानम् न चैव हि।  (भारद्वाज आचारभूषण १०३-१०४)  
८ सूतके तु सावित्र्याञ्जलिं प्रक्षिप्य प्रदक्षिणम्|
कृत्वा सूर्य तथा ध्यायन् नमस्कुर्यात् पुनः-पुनः।  
९- (क) अपान्नश्चाशुचिः काले तिष्ठन्नपि जपेद् दश।  (आचारभूषण पृ। १०४) 
(ख) आपद्यध्वन्यशक्तश्च संध्यां कुर्वीत मानसीम् | 
(गौतम)


संध्योपासन

 

गतांक से आगे

फिर प्राणायाम करें।  

प्राणायाम का विनियोग - 

प्राणायाम करनेके पूर्व उसका विनियोग इस प्रकार पढ़े 

१ - शास्त्रका कथन है कि पर्वतसे निकले धातुओका मल जैसे अग्निसे जल जाता है, उसी प्रकार प्राणायामसे आन्तरिक पाप जल जाते हैं 

यथा पर्वधातुनां दोषान् हरति पावकः।  

एवमन्तर्गतं पापं प्राणायामेन दह्यते 

(प्रयोगपारिजात, अत्रिस्मृ० २/३) 

प्राणायाम करनेवाला आग की तरह चमक उठता है 

प्राणायामैस्त्रिभिः पुतस्तत्क्षणाज्जलतेऽग्निवत् //

(प्रयोगपारिजात)

यही बात शब्द - भेदसे अत्रिस्मृति (३.३) में कही गयी है। भगवान्  ने कहा है कि प्राणायाम सिद्ध होने पर हजारों वर्षोकी लम्बी आयु प्राप्त होती है। अतः चलते फिरते सदा प्राणायाम किया करें 

गच्छंस्तिष्ठन् सदा कालं वायुस्वीकरणं परम्।  

सर्वकालप्रयोगेण सहस्रायुर्भवेन्नर: 

प्राणायाम की बड़ी महिमा कही गयी है। इससे पाप - ताप तो जल ही जाते हैं, शारीरिक उन्नति भी अद्भुत ढंगसे होती है। हजारों वर्षकी लंबी आयु भी इससे मिल सकती है। सुन्दरता और स्वास्थ्यके लिये तो यह मानो वरदान ही है। यदि प्राणायामके।  ये लाभ बुद्धिगम्य हो जायें तो इसके प्रति आकर्षण बढ़ जाय और तब इससे राष्ट्र का बड़ा लाभ हो। 

जब हम साँस लेते हैं, तब वहाँ मिले हुए आक्सीजनसे फेफड़ों में पहुँचा हुआ अशुद्ध काला रक्त शुद्ध होकर लाल बन जाता है। इस शुद्ध रक्त को हृदय पम्पिंग - क्रियाद्वारा  शरीरमें संचार कर देता है। यह रक्त शरीरके सभी घटकोंको खुराक बाँटता - बाँटता स्वयं काला पड़ जाता है। तब हृदय इस उपकारी तत्त्वको फिरसे शुद्ध होनेके लिये फेफड़ोमें भेजता है। वहाँ सांस में मिले प्राणवायु (आक्सीजन) के द्वारा यह फिर से सशक्त हो जाता है और फिर सभी घटकोंको खुराक बाँटने वाली शरीरकी जीवनी - शक्तिको बनाये रखता है।  यही कारण है कि सांसके बिना पाँच मिनट भी जीना कठिन हो जाता है किंतु रक्तको शोधन - क्रियामे एक बाधा पड़ती रहती है।  साधारण सांस फेफड़ों की सूक्ष्म कणिकाओतक पहुँच नहीं पाती। इसकी यह अनिवार्य आवश्यकता देख भगवान् ने प्रत्येक सत्कर्म के आरम्भ में इसका (प्राणायामका) सनिवेश कर दिया है।  कभी - कभी तो सोलह सोलह प्राणयामोका विधान कर दिया है 

‌‍ द्वौद्वौ प्राप्तस्तु मध्याह्ने त्रिभि संध्या सुरार्चने।  

भोजनादौ भोजनान्ते प्राणायामास्तु षोडश ।।

(देवीपुराण)

किंतु भगवान् की यह व्यवस्था तो शास्त्र मानकर चलनेवाले अधिकारी पुरूषों के लिये हुई, पर प्राणायाम सभी प्राणियोंके लिये अपेक्षित है।  अतः भगवान् ने प्राणायामकी दूसरी व्यवस्था प्रकृतिके द्वारा करवायी है।  हम जो खर्राटे भरते हैं, वह वस्तुतः प्रकृतिके द्वारा हमें बना दिया प्राणायाम ही है।  इस प्राणायामका नाम भस्त्रिका प्राणायाम 'है।  भस्त्रिका 'का अर्थ है - भाथी'।  भाथी इस गहराईसे वायु खींचती है कि जिससे उसके प्रत्येक अवयवतक वायु पहुंच जाती है और वह पूरी फूल उठती है और वह इस भाँति वायु फेंकती है कि उसका प्रत्येक अवयव भलीभांति सिकुड़ जाता है।  इसी तरह भस्त्रिका प्राणायाम में वायुको इस तरह खींचा जाता है कि फेफड़े के प्रत्येक कणिकातक वह पहुँच जाते हैं और छोड़ते समय प्रत्येक कणिकासे वह निकल जाते हैं।  इस प्राणायाम में 'कुम्भक' नहीं होता और न मन्त्रकी ही आवश्यकता पड़ती है।  केवल ध्यानमात्र करना चाहिए 

'अगर्भो ध्यानमात्रं तु स चामन्त्रः प्रकीर्तितः ।।  

(देवीपुराण ११ .२०.३४) 

स्वास्थ्य और सुन्दरता बढ़ानेके लिये और भगवान् के सानिध्यको प्राप्त करनेके लिये तो प्राणायाम शत - शत अनुभूत है।  भस्त्रिका - प्राणायामकी कई विधियाँ है।  उनमें से एक प्रयोग लिखा गया है प्रात: खाली पेट शवासनसे लेट जाय।  मेरुदण्ड सीधा होना चाहिए।  इसलिए चौकी या जमीन पर लेट जाना, फिर मुँह बंद कर नासे धीरे - धीरे साँस खींचना।  जब खींचना बंद हो जाय, तब मुखसे फुंकते हुए धीरे - धीरे छोडे, रोके नहीं।  भगवान् का ध्यान चलता है।  यह प्रयोग बीस मिनट से कम न हो।  यहाँ ध्यान देनेकी बात यह है कि साँस लेना और छोड़ना अत्यन्त धीरे - धीरे हो।  इतना धीरे - धीरे कि नाकके पास हाथ थामे हुए सत्तू भी उड़ न सके 

न प्राणेनाप्यपानेन वेगाद् वायु सुमुच्छ्वसेत्।  

येन सक्तुन करस्थांश्च निःश्वासो नैव चालयेत् ।।  

प्रणवस्य ऋषिर्ब्रह्मा गायत्री छंद एव च।  

देवोऽग्निः परमात्मा स्याद् योगो वै सर्वकर्मसु।  

(अग्निपु। २१५।३२)

ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।

ॐ सप्तव्याहृतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवशिष्ठकश्यपा  ऋषयो गायत्र्युष्णिगनुस्टुब्बृहती पङ्क्तित्रिष्टुब्जभृत्जुबज्यगत्यश्छन्दास्यनवाय्वादित्यबृहष्पतिवरुणेन्द्रविष्णवो देवता अनादिष्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः।  

ॐ तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता प्राणायामे विनियोगः।  

ॐ आपो ज्योतिरीति शिरस: प्रजापतिर्ऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्य देवता: प्रणायामे विनियोगः।  

(क) प्राणायामके मन्त्र - 

फिर आँखें बंद कर नीचे लिखित मन्त्रोंका प्रत्येक प्राणायाम तीन - तीन बार (या पहले एक बारसे ही आरम्भ करे, धीरे - धीरे तीन - तीन बारका अभ्यास बढ़ावे) पाठ करे।  

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः  ॐ सत्यम्।  ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।  

(तै आ तै प्र ० १० अ ० २०): 

व्याहृतिनां तु सर्वासामृषिरेव प्रजापतिः।  

व्यस्ताश्चैव समस्ताश्च ब्राह्मक्षरमोमिति ।।  

विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः।  

ऋषिरत्रिविसिष्ठश्च कश्यपश्च यथाक्रमम् 

अग्निर्वायु रविश्चैव वाक्पतिर्वरुणस्तथा।  

इन्द्रो विष्णुर्व्याहृतिनां दैवतानि यथाक्रमम् ।।  

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्  च बृहतीपंक्तिरेव च।  

त्रिष्टुप् च जगति चेतिच्छन्दांस्याुहुरनुक्रमात् ।।  

(अग्निपुराण २१५। २३५-३ १) 

१ - 'आपो ज्योती रस' इति गायत्र्यास्तु शिरः स्मृतम्।  ऋषि: प्रजापतिस्तस्य छन्दोहीनं यजुर्यतः ।।  ब्रह्माग्निवायुसूर्याश्च देवताः परिकीर्तिताः   ।। 

(अग्निपुराण २१५१४४-४५)

प्राणायाम की विधि



प्राणायाम के तीन भेद होते हैं १ पूरक, २ कुम्भक और ३ रेचक। 

१ - अँगूठे से नाकके दाहिने छिद्र को दबाकर बायें छिद्र से श्वासको धीरे - धीरे खींचने को पूरक प्राणायाम ’कहते हैं।  मूल्य निर्धारण प्राणायाम करते समय उपर्युक्त मन्त्रोंका मनसे उच्चारण करते हुए नाभिदेशमें नीलकमलके दलके समान नीलवर्ण चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं।  2 - जब सांस खींचना पड़ जाए, तब अनामिका और कनिष्ठिका अंगुलीसे नाकके छिद्रों को भी दबा दें।  मन्त्र जपता रहा।  यह कुम्भक प्राणायाम ’हुआ।  इस अवसरपर हृदयमें कमलपर विराजमान लाल वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माका ध्यान करते हैं।

३ - अँगूठे को हटाकर दाहिने छिद्र से श्वासको धीरे - धीरे छोड़नेको रेचक प्राणायाम 'कहते हैं।  इस समय ललाट में श्वेतवर्ण शंकरका ध्यान करना चाहिए।  मनसे मन्त्र जपते रहें। 

(ग) प्राणायाम के बाद आचमन- 

प्रातःकालका विनियोग और मन्त्र

प्रातःकाल नीचे लिखित विनियोग पढ़कर पृथ्वीपर जल छोड़ दे - 

पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रको पढ़कर आचमन करे 

सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्।  यद्रत्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु।  यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ।। (तै आ ० प्र ० १०, अ ० २५) 

मार्जन - 

इसके बाद मार्जनका निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बायें हाथमे जल के बारे में कुशोंसे या दाहिने हाथकी तीन अँगुलियोंसे १ से ७ तक तक नानत्रोंको बोलकर सिरपर जल जमा हो जाता है।  ८ वें मन्त्रसे पृथ्वी पर और ९वें से फिर सिरपर जल छिड़कें । 

विप्रुषोऽष्टौ क्षिपेन्मूर्ध्नि अथो सस्य क्षयाय च।  (व्यासस्मृति)

ॐ आपो  हि ष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्द: आपो देवता मार्जने विनियोग: 

३ - 'आपो हि ष्ठे' त्यूचोऽस्याश्च सिन्धुद्वीप ऋषिः स्मृतः  ब्रह्मस्नानाय छन्दोऽस्य गायत्री देवता जलम्।  

मार्जने विनियोगोऽस्य ह्यावभृथ के क्रतोः 

(अग्निपु ० २१५.४१-४२) 

(योगियाज्ञवल्क्यस्मृति भी भी इसका प्रमाण मिलता है)

१ ऊँ आपो हि ष्ठा मायोभुवः।  

२  ऊँ ता न उर्जे दधातन।  

३  ऊँ महे रणया चक्षसे।  

४  ॐ यो वाः शिवतमो रसः।  

५  ॐ तस्य भाजयतेह नः।  

६  ॐ उशतीरिव मातरः।  

७  ॐ तस्मा अरं गमाम वः।  

८  ॐ यस्य क्षायय जिन्वथ  

९  ॐ आपो जनयथा च नः।  

(यजु ० ११। ५०-५२) 

मस्तक पर जल छिड़कने के विनियोग और मंत्र 

निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बाएं हाथ में जल लेकर  दाहिने हाथ से ढँक दें और निम्नलिखित मंत्र पढ़कर सिर पर छिड़कें।  

विनियोग

द्रुपदादिवेतस्य कोकिलो राजपूत्र ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवताः शिरस्सेके विनियोगः।  

१ - कोकिलो राजपुत्रस्तु द्रुपदाया ऋषिः स्मृतः।  

अनुष्टुप् च भवेच्छन्द आपश्चैव तु दैवतम् ।।  

(योगी याज्ञवल्क्य, अाह्निक सूत्रावली)  

मंत्र -  ॐ द्रुपदादिव मुमुचान: स्विन्न: स्नातो मलादिव।  

पुतं पवित्रेणवाज्यमाप: शुन्धन्तु मैनसः 

(यजु 020.20) 

अघमर्षण और आचमन के विनियोग और मंत्र - 

नीचे लिखे विनियोग को पढ़ने के बाद दाहिने हाथ में जल लेकर उसे नाक से लगाकर मंत्र पढ़े और ध्यान करें कि '' समस्त पाप दाहिने नाक से निकल कर हाथ के जल में आ गए हैं।  फिर बिना देखे उस पानी को बाईं ओर फेंक दें।  

उद्धृत्य दक्षिणे हस्ते जलं गोकर्णवत् कृते

निःश्वसन् नासिकाग्रे तु पाप्मानं पुरुषं स्मरेत् 

ऋतं चेति ऋचं वापि द्रुपदां वा जपेद् ऋचम्।  

दक्षनासापुटेनैव पाप्मानमपसारयेत्।  

तज्जलं नावलोक्याथ वामभागे क्षितौ त्यजेत् ।।  

(प्रजापति, देव ११/१६। ४५ - ४७)

अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोग:।  

अघमर्षणसुक्तस्य ऋषिरेवाघमर्षणम्।  

अनुष्टुप् च भवेच्छन्दो भाववृत्तस्तु दैवतम् ।।  

(अग्निपुराण २१५. ४३. ४३)

ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रोऽअर्णवः।।१।। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरोऽअजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।२।। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।३।।

फिर, निम्नलिखित विनियोग करें।  फिर इस मंत्र के साथ आचमन  करें।  

ॐ अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः 

ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्यसंहिता २. ७३ 

फिर से इस मंत्र से आचमन करें

अग्निपुराण में इस मंत्र का पाठ इस प्रकार है- 

अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वामूर्तिषु।  

तपोयज्ञवषट्कार आपो ज्योति रसामृतम्।  

(२१५.४६-४७) 

ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः|

त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् || 

(कात्यायन, परिशिष्ट सूत्र) 

सूर्यार्घ्य - विधि - 

इसके बाद निम्नलिखित विनियोग का पढ़कर अञ्जलि से अँगूठे को अलग हटाकर गायत्री मंत्र से सूर्य , 

मुक्तहस्तेन दातव्यं मुद्रां तत्र न कारयेत्।  तर्जन्यंगुष्ठयोगेन रक्षसीमुद्रिकार्घ्येण तत्तोयं रुधिरं भवेत् ।।  

(अविस्मृति, देवीभा -११|१६|४९)

भगवान् को जल से अर्घ्य दे | अर्घ्य में चन्दन और फूल मिला 

ले | सुबह और दोपहर को एक एड़ी उठाये हुए खड़े होकर अर्घ्य देना चाहिए | सुबह कुछ झुककर खड़े हों और दोपहर को सीधे खड़े होकर और शाम को बैठकर | सुबह और शाम को तीन - तीन अञ्जलि दे और दोपहर को एक अञ्जलि |


सुबह और दोपहर को जल में अञ्जलि उछाले और शाम को धोकर स्वच्छ किये स्थल पर धीरे से अञ्जलि दे | ऐसा नदीतट पर करें | अन्य जगहों में पवित्र स्थल पर अर्घ्य दे, जहाँ किसी का पैर ना लगे | अच्छा है कि किसी बर्तन में अर्घ्य देकर किसी वृक्ष के मूल में डाल दिया जाये 

सूर्यार्घ्य का विनियोग

सूर्य का अर्घ्य देने से पहले, निम्न विनियोग पढ़ें।  

ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अर्घ्यदाने विनियोगः।

(ख)  ॐ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतिना परमेष्ठि प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुपश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्यादेवताः अर्घ्यदाने विनियोगः।

(ग) ॐ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता सूर्यार्घ्यदाने विनियोगः।  


ईषन्नम्र प्रभाते वै मध्याह्ने दण्डवत स्थितः।  

आसने चोपविस्टस्तु द्विजः संध्या क्षिपेदपः।  

जलेष्वर्घ्यं प्रदातव्यं जलाभावे शुचिस्थले।  

सम्प्रोक्ष्य वारिणा सम्यक् ततोेऽर्घ्य तु प्रदापयेत् ।।  (अग्निस्मृति)


इस प्रकार विनियोग कर नीचे लिखे मंत्र का पढ़कर अर्घ्य दें:


ॐ भूर्भुव: स्व:  तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रोचोदयात्।  

(शुकलेज्जु ३६.३) 


इस मंत्र का पढ़कर ब्रह्मस्वरुपिणेे सूर्यनारायणाय नमः' कहकर अर्घ्य दें। 

ॐ भूर्भुव: स्व:  तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रोचोदयात् |ॐ भूर्भुव: स्व:

विशेष - 

यदि समय (सुबह सूर्योदय से और सूर्यास्त के तीन घड़ी बाद) का अतिक्रमण हो जाय  तो प्रायश्चित के रूप में, नीचे लिखे मंत्र से पहले एक अर्घ्य देकर, फिर उक्त अर्घ्य दें।  


उपस्थान - 

सूर्य के उपस्थान के लिए प्रथम निम्नलिखित विनियोगों को पढ़ें।  

उद्वयमित्यस्य प्रस्कण्व र्ऋषिरनुष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः |

(ख) उदु त्यमित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिर्निचृद्गायत्री छंदः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने  विनियोगः। 

 (ग)चित्रमित्यस्य कौत्स ऋषिस्त्रिष्टुप् सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः। 

 (घ) ।  तच्चक्षुरित्यस्य दध्यंथवर्ण ऋषिरक्षरातीतपुरउष्णिकछन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः। 

१ - कालातिक्रमणे चैव त्रिसंध्यमपि सर्वदा।  

चातुर्थ्यार्घ्य प्रकुर्वीत भानोर्व्याहृति न सम्पूटम्।। 

२ - शुकलेज्जुर्वेद - सर्वानुक्रम।  

३ चित्रं देवेती ऋचके ऋषि: कौत्स उदाहृतः त्रिस्टुप् छंदो दैवतं च सूर्योऽस्या परिकीर्तितम्  

(अग्निपुराण २१५.४ ९) 

४ यजुर्वेद - सर्वानुक्रम।


इसके बाद प्रातः चित्र के अनुसार खड़े होकर  और दोपहर में दोनों हाथों को उठाकर और शाम को बैठकर हाथ जोड़कर और नीचे लिखे मंत्रों का पाठ करते हुए सूर्योपस्थान करें।


सूर्योपस्थान का मन्त्र 

(क)  ॐ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् | 

देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरूत्तमम् 

(यजु.२०.२१) 


(ख) ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः दृशे विश्वाय सूर्यम्।  

(यजु-1१४१) 


( ग ) ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।  आप्रा द्यावापृथिवीँ अंतरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।  


(घ) ॐ तच्चक्षुर्देवितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।  पश्येम शरदः शतं जिवेम शरदः शतँ श्रृणुयाम शारदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीना: स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।

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इसके बाद गायत्री जप का विधान है जिसका लिंक उपरोक्त दिया गया है, और यहां भी दिया जा रहा है |

 गायत्री मंत्र के जप का संपूर्ण विधान

गायत्री जप का विधान

सर्व प्रथम ब्रह्म मूहुर्त मे स्नान आदि से निवृत्त होकर गायत्री मां की प्रतिमा के सामने आसन पर आराम से बैठ जाइये 

और मानसिक शुध्दि का मंत्र बोलें और जल छिड़कें


ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा |

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ||

ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु |

गायत्री जपका विधान षडङ्गन्यास - 

गायत्री - मन्त्रके जपके पूर्व षडङ्गन्यास करनेका विधान है।  अतः आगे लिखे एक - एक मन्त्रको बोलते हुए चित्रके अनुसार उन अगोंका स्पर्श करे

ऊँ हृदयाय नमः

ऊँ भूः शिरसे स्वाहा

ऊँ भुवः शिखायै वषट्

ऊँ स्वः कवचाय हुम्

ऊँ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट्

ऊँ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्

आवाहन मंत्र विनियोग

तेजsसीति धामनामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषि‍र्यस्‍त्रि‍ष्‍टुबुष्‍णि‍हौ छन्‍दसी आज्‍यं देवता गायत्र्यावाहने विनियोग

'ॐ तेजोॐसि शुक्रम्रासस्मृतमसि।  धन्मनाशिनी प्रियं देवानाम्ना धृष्टं देवयज्ञमसि।  

 गायत्रीदेवीका उपस्थान (प्रणाम) -आवाहन करने पर गायत्री देवी आ गयी हैं, ऐसे मानकर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे 

गायत्रीयसी विवस्वान् ऋषि ऋषिः स्वराणमपपत्तिमछन्दन्दः परमात्मा गायत्रीपरा।  ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसिद्धि।  न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पद पर परजसेऽसावदो मा प्राप्ति।  

गायत्री - उपस्थानके बाद गायत्री - शापविमोचनका और गायत्री मन्त्र - जपसे पूर्व चौबीस मुद्राओंके करनेका भी विधान है, लेकिन नित्य संज्ञाजनन्यास अनिवार्य न होनेपर भी उन्हें जो विशेषरूपसे करने को तैयार हैं, उनके लिए यहाँ विशेष रूप से दिया जा रहा है।  

गायत्री - शापविमोचन ब्रह्मा, वसिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रके द्वारा गायत्री मन्त्र शापित है।  अतः शाप - निवृत्तिके हेतु शाप - विमोचन करना चाहिए।  

(१) ब्रह्म - शापविमोचन - विनियोग |  

- अस्य श्रीब्रह्म शापविमोचनमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्भुक्तिमुद् ब्रह्मदापविमोचनी गायत्री शक्तिर्देवता गायत्री छन्दः ब्रह्मशापविमोचने विनियोगः।  

ॐ गायत्रीं ब्रह्मेत्युपासीत यद्रूपं ब्रह्मविदो विदुः।  तां पश्यन्ति धीराः सुमनसो वाचामग्रो ।।  ॐ वेदान्तनाथ विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्।  ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं ब्रह्मश्पाद्विमुक्ता भव।

(२) वसिष्ठ - शपविमोचन - विनियोग ओम अस्य श्री वसिष्ठ शापविमोचनमन्त्रस्य निग्राहानुग्रहचार्य वसिष्ठ ऋषिरस्विनस्तुनुग्रहीता गायत्री शक्तिर्देवता विश्वोद्भव गायत्री छन्द: वशिष्ठ शाप विमोचनार्थ जपे विनियोगः

 ॐ सोSहमर्कयमं ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्र: सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् 

योनीमुद्रा दिखाकर तीन बार गायत्री मंत्र जपे।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव।  

(३) विश्वामित्र - शापविमोचन - विनियोग - ऊँ अस्य श्रीविश्वामित्रशापवमोचनमंत्रस्य नूतनसृष्टिकर्ता विश्वामित्रऋषिर्विश्वामित्रानुगृहीता गायत्री शक्तिर्देवता वाग्देहा गायत्री छन्दः विश्वामित्रशापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  मन्त्र 

ऊँ गायत्री भजाम्यग्निमुखिं विश्वगर्भा यदुद्भवाः।  देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टिं तां कल्याणीमिष्टकरीं प्रपद्ये   

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं विश्वामित्रश्चापाद्विमुक्ता भव।  

(४) शुक्र - शापविमोचन - विनियोग -

 ऊँ अस्यश्रीशुक्रशाप विमोचनमन्त्रस्य श्रीशुक्रऋषिः अनुष्टुप्छन्दः देवी गायत्री देवता शुक्रश्चापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  

मन्त्र 

सो्योहमर्कमयं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् ।।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं शुक्रशापाद्विमुक्ता भव।  

प्रार्थना 

ऊँ अहो देवि महादेवी संध्ये विद्ये सरस्वती!  अजरे अमरे चैव ब्रह्म्योनिर्नमोस्तुते ।।  ॐ देवि गायत्री त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भव वसिष्ठाशापाद्विमुक्ता भव, विश्वामित्रशापाद्विविमुक्ता भव, शुक्राशपद्विमुक्ता भव।  

जप से पूर्व की चौबीस मुद्रायें ।  

सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा

द्विमुखम् त्रिमुखम चैव चतुष्पंचमुखम् तथा। 

षण्मुखाsधोमुखं  चैव व्यपाकंजलिकं तथा।  

शकटं यमपाशं च ग्रथितं चोन्मुुखोन्मुखं।  

प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यः कूर्मो वराहकम्। 

 सिंहक्रांतं महाक्रांतं मुद्गरं पल्लवं तथा।  

एता मुद्राश्चतुर्विंशज्जापादौ परिकीर्तिताः ।






गायत्री - मन्त्रका विनियोग - इसके बाद गायत्री मन्त्रके जपके विनियोग पढ़े -

  ऊँकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, ऊँ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतिनां परमेष्ठि प्रजापति

र्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दासि अग्निवायुसूर्या देवताः, ऊँ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः

इसके पश्चात कम से कम 108 बार गायत्री मंत्र का जप करें

गायत्री - मन्त्र 

ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  

शक्तिमन्त्र जपकी करमाला - चित्र - संख्या के अनुसार अंक एकसे आरम्भकर दस अंक तक अँगूठे से जप करनेसे एक करमाला होती है (दे ० भा ० १११। १ ९-९ १ ९) तर्जनीका मध्य और अग्रपर्व ​​सुमेरु है।  इस प्रकार दस करमाला जप करनेसे जप - संख्या एक सौ हो जायगी, तत्पश्चात चित्र - संख्या २ के अनुसार अंक १ से आरम्भ कर अङ्क ८ तक जप करनेसे १०८ की एक माला होती है।



 जपके बादकी आठ मुद्राएँ 

सुरभिर्ज्ञानवैराग्ये योनिः शंखोङथ पंकजम् लिंगनिर्वाणमुद्राश्च जपान्तेsष्टौ प्रदर्शयेत्

सूर्य - प्रदक्षिणा 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।  

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ।।  

भगवानको जपका अर्पण - अंतर्धान भगवान्को यह वाक्यबोलते हुए जप निवेदित करे - 

अनेन गायत्रीजपकर्मणा सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायणः प्रीयतां न मम्।  

गायत्री देवीका विसर्जन - 

निम्नलिखित विनियोगके साथ आगे बताये गये मन्त्रसे गायत्रीदेवीका विसर्जन करे

विनियोग - '

उत्तमे शिखरे' इत्यस्य वामदेव ऋषिरुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।  

गायत्रीके विसर्जनका मन्त्र 

ऊँ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनी।  ब्राह्मणेभ्योऽभ्यानुज्ञाता गच्छ देवि!  यथासुखम्।

संध्योपासनकर्म का समर्पण - 

इसके बाद नीचे लिखे वाक्य पढ़कर संध्योपासनमन को भगवान् को  समर्पित कर दे 

'अनेन संध्योपासनाख्येन कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतां न मम।  ॐ त्सत श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।  

'फिर भगवान् का  स्मरण करे 

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिशु।  न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् श्रीविष्णुवे नमः, श्रीविष्णवे नमः, श्रीविष्णवे नमः| श्रीविष्णुस्मरणात्  परिपूर्णतास्तु।

संध्या समाप्त होने पर पात्रों में बचा जल हुआ ऐसे स्थान या वृक्षकी मूल में गिरा दे जहाँ किसी का भी पाँव न पड़े।  संध्या - समाप्तिके बाद आसनके नीचे किंचित् जल गिराकर उससे मस्तक में  तिलक करे।  




बुधवार, 2 सितंबर 2020

संध्योपासन



संध्याके लिए पात्र आदि 
१ - लोटा प्रधान जलपात्र -१ 
२ - घंटी और संध्याका विशेष जलपात्र -१ 
३ - पात्र - चन्दन - पुष्पादिके लिये - १
४ - पञ्चपात्र - २ 
५  - आचमनी - २
६ - अर्घा - १
 ७ जल - जल गिरानेके लिये तामड़ी (छोटी थाली) -१ 
८ - आसन - १







संध्योपासन
 
 - विधि संध्योपासन द्विजमात्रके लिए बहुत ही आवश्यक कर्म है।  इसके बिना पूजा आदि कार्य करनेकी योग्यता नहीं आती है।  अतः द्विज मात्रके लिये संध्या करना आवश्यक है।  

स्नानके बाद दो वस्त्र धारणकर पूर्व, ईशानकोण या उत्तरकी ओर मुंह कर आसनपर बैठ जाय।  आसनकी ग्रन्थि उत्तर - दक्षिणकी ओर हो।  तुलसी, रुद्राक्ष आदि की माला धारण कर ले।  दोनों अनामिकाओं पावित्रि धारण कर ले।  गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बाँधे और तिलक लगा ले और आचमन करे 

आचमन 

- 'ऊँ' केशवाय नमः, 'ऊँ' नारायणाय नमः, 'ऊँ' माधवाय नमः' - इन तीन मन्त्रों से तीन बार आचमन करके 'ॐ हृषीकेशाय नमः' इस मन्त्रको बोलकर हाथ धो लें।  
पहले विनियोग पढ़े, फिर मार्जन करे (जल छिड़कें)।  

१ संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। 
(दक्षस्मृति २। २७) 

निम्नलिखित स्थितिमें संध्याके लोप होने पर पुण्यका साधन होनेके कारण दोष नहीं माना गया है। 

राष्ट्रक्षोभे नृपक्षोभे रोगाते भय आगते।  
देवाग्निद्विजभूपानां कार्ये महति संस्थिते।।  
संध्याहानौ न दोषोऽस्ति यतस्तत् पुण्यसाधनम् ।।  (जमदग्नि) 

२ - जिनके पास संध्या करनेके लिए समयका अभाव हो और संध्याके मन्त्र भी याद न हों, वे कम - से - कम आचमन कर गायत्रीमंत्र से प्राणायाम और गायत्रीमन्त्र तीन बार सूर्यार्घ्य देकर करमाला पर दस बार गायत्री मन्त्रक जप कर लें।  न करनेकी अपेक्षा इतने मात्रसे भी संध्याकी पूर्ति हो सकती है।  

३ संध्या - 
पूजामें आवलेके बराबर रुद्राक्षकी ३२ मणियोंकी माला कण्ठीरूपमें धारण करनेका भी विधान है।

मार्जन - विनियोग - मन्त्र -

 'ऊँ' अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीच्छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।  

'इस प्रकार विनियोग पढ़कर जल छोडे और निम्नलिखित मन्त्रसे मार्जन करे (शरीर और सामग्री पर जल छिड़कें )।  

(नोट - १- विनियोग पढ़कर जल छोड़नेकी विधि शास्त्रों में नहीं मिलने के कारण कुछ विद्वानोंका मत है कि विनियोगों जल छोड़नेका प्रचलन अर्वाचीन है।  मुख्यरूपसे ऋषि, देवता आदिके स्मरणका महत्त्व माना गया है।  इसलिए विनियोगका पाठमात्र भी किया जा सकता है।  
 २ - अग्निपुराण २१५।४३)

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्ववस्थां गतोऽपि वा।  
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः  शुचिः ।। 

 तदनन्तर आगे लिखा विनियोग पढ़े - 

'ऊँ' पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता आसनपवृतिकरणे विनियोगः।  

'फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आसनपर जल छिड़कें  

'ऊँ' पृथ्वि !  त्वया धृता लोका देवि!  त्वं विष्णुना धृता। 
त्वं च धारक मां देवि!  पवित्र कुरु चासनम् ।। 

संध्याका संकल्प - 

इसके बाद हाथमे कुश और जल लेकर संध्या का संकल्प पढ़कर जल गिरा दे -
 'ऊँ'विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पेवैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतखण्डे भारतवर्षे....स्थाने... नामसंवत्सरे...  ऋतौ ...मासे.... पक्षे....तिथौ.... दिने...... प्रातःकाले... गोत्रः (शर्मा, वर्मा, गुप्तः) उपात्तदुरितक्षयपूर्वकश्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं संध्योपासनं करिष्ये।  

'आचमन - 
इसके लिए निम्नलिखित विनियोग पढ़े

 'ऊँ' ऋतं चेति माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्पर्शने विनियोगः।  

फिर नीचे लिखे मन्त्र पढ़कर आचमन करे 

'ऊँ' ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत ।  ततो रात्र्यजायत।  ततः समुद्रो अर्णवः।  समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।  अहोरात्राणि विद्द्वद्विश्वस्य मिष्तो वशी।  सूर्याचंद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।  दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।  
(ऋग्वेद १०। १ ९ ० / १) 

तन्नन्तर दायें हाथमें जल लेकर बायें हाथसे ढककर 'ऊँ' के साथ तीन बार गायत्रीमन्त्र पढ़कर अपनी रक्षाके लिए अपने चारों ओर जल धारा दे। 

क्रमशः

सोमवार, 31 अगस्त 2020

गायत्री जप का विधान

  



 गायत्री मंत्र के जप का संपूर्ण विधान

वैसे गायत्री मंत्र का पाठ किसी भी प्रकार से करने पर लाभ प्राप्त होता है लेकिन उसे विधि पुर्वक करने के अपना अलग हि महत्व है

जैसे

दरिद्रता का नाश

सन्तान सम्बन्धी परेशानी से छुटकारा 

शत्रु परास्त होते हैं

विवाह कार्य में अड़चन में लाभ

रोग निवारण मे सहायक आदि अनेक लाभ हैं मां गायत्री जप के

गायत्री जप का विधान

सर्व प्रथम ब्रह्म मूहुर्त मे स्नान आदि से निवृत्त होकर गायत्री मां की प्रतिमा के सामने आसन पर आराम से बैठ जाइये 

और मानसिक शुध्दि का मंत्र बोलें और जल छिड़कें


ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा /

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः //

ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु /




गायत्री - जपका विधान षडङ्गन्यास - गायत्री - मन्त्रके जपके पूर्व षडङ्गन्यास करनेका विधान है।  अतः आगे लिखे एक - एक मन्त्रको बोलते हुए चित्रके अनुसार उन अगोंका स्पर्श करे



ऊँ हृदयाय नमः

ऊँ भूः शिरसे स्वाहा

ऊँ भुवः शिखायै वषट्

ऊँ स्वः कवचाय हुम्

ऊँ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट्

ऊँ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्



आवाहन मंत्र विनियोग


तेजsसीति धामनामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषि‍र्यस्‍त्रि‍ष्‍टुबुष्‍णि‍हौ छन्‍दसी आज्‍यं देवता गायत्र्यावाहने विनियोग


'ॐ तेजोॐसि शुक्रम्रासस्मृतमसि।  धन्मनाशिनी प्रियं देवानाम्ना धृष्टं देवयज्ञमसि।  

 गायत्रीदेवीका उपस्थान (प्रणाम) -आवाहन करने पर गायत्री देवी आ गयी हैं, ऐसे मानकर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे 

गायत्रीयसी विवस्वान् ऋषि ऋषिः स्वराणमपपत्तिमछन्दन्दः परमात्मा गायत्रीपरा।  ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसिद्धि।  न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पद पर परजसेऽसावदो मा प्राप्ति।  

गायत्री - उपस्थानके बाद गायत्री - शापविमोचनका और गायत्री मन्त्र - जपसे पूर्व चौबीस मुद्राओंके करनेका भी विधान है, लेकिन नित्य संज्ञाजनन्यास अनिवार्य न होनेपर भी उन्हें जो विशेषरूपसे करने को तैयार हैं, उनके लिए यहाँ विशेष रूप से दिया जा रहा है।  

गायत्री - शापविमोचन ब्रह्मा, वसिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रके द्वारा गायत्री मन्त्र शापित है।  अतः शाप - निवृत्तिके हेतु शाप - विमोचन करना चाहिए।  

(१) ब्रह्म - शापविमोचन - विनियोग |  

- अस्य श्रीब्रह्म शापविमोचनमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्भुक्तिमुद् ब्रह्मदापविमोचनी गायत्री शक्तिर्देवता गायत्री छन्दः ब्रह्मशापविमोचने विनियोगः।  

ॐ गायत्रीं ब्रह्मेत्युपासीत यद्रूपं ब्रह्मविदो विदुः।  तां पश्यन्ति धीराः सुमनसो वाचामग्रो ।।  ॐ वेदान्तनाथ विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्।  ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं ब्रह्मश्पाद्विमुक्ता भव।


(२) वसिष्ठ - शपविमोचन - विनियोग ओम अस्य श्री वसिष्ठ शापविमोचनमन्त्रस्य निग्राहानुग्रहचार्य वसिष्ठ ऋषिरस्विनस्तुनुग्रहीता गायत्री शक्तिर्देवता विश्वोद्भव गायत्री छन्द: वशिष्ठ शाप विमोचनार्थ जपे विनियोगः


 ॐ सोSहमर्कयमं ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्र: सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् 

योनीमुद्रा दिखाकर तीन बार गायत्री मंत्र जपे।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव।  


(३) विश्वामित्र - शापविमोचन - विनियोग - ऊँ अस्य श्रीविश्वामित्रशापवमोचनमंत्रस्य नूतनसृष्टिकर्ता विश्वामित्रऋषिर्विश्वामित्रानुगृहीता गायत्री शक्तिर्देवता वाग्देहा गायत्री छन्दः विश्वामित्रशापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  मन्त्र 

ऊँ गायत्री भजाम्यग्निमुखिं विश्वगर्भा यदुद्भवाः।  देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टिं तां कल्याणीमिष्टकरीं प्रपद्ये   

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं विश्वामित्रश्चापाद्विमुक्ता भव।  


(४) शुक्र - शापविमोचन - विनियोग -

 ऊँ अस्यश्रीशुक्रशाप विमोचनमन्त्रस्य श्रीशुक्रऋषिः अनुष्टुप्छन्दः देवी गायत्री देवता शुक्रश्चापविमोचनार्थ जपे विनियोगः।  

मन्त्र 

सो्योहमर्कमयं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः।  आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसो्यस्म्यहम् ।।  

ॐ देवि!  गायत्री!  त्वं शुक्रशापाद्विमुक्ता भव।  

प्रार्थना 

ऊँ अहो देवि महादेवी संध्ये विद्ये सरस्वती!  अजरे अमरे चैव ब्रह्म्योनिर्नमोस्तुते ।।  ॐ देवि गायत्री त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भव वसिष्ठाशापाद्विमुक्ता भव, विश्वामित्रशापाद्विविमुक्ता भव, शुक्राशपद्विमुक्ता भव।  

जप से पूर्व की चौबीस मुद्रायें ।  

सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा

द्विमुखम् त्रिमुखम चैव चतुष्पंचमुखम् तथा। 

षण्मुखाsधोमुखं  चैव व्यपाकंजलिकं तथा।  

शकटं यमपाशं च ग्रथितं चोन्मुुखोन्मुखं।  

प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यः कूर्मो वराहकम्। 

 सिंहक्रांतं महाक्रांतं मुद्गरं पल्लवं तथा।  

एता मुद्राश्चतुर्विंशज्जापादौ परिकीर्तिताः ।






गायत्री - मन्त्रका विनियोग - इसके बाद गायत्री मन्त्रक जपके विनियोग पढ़े -

  ऊँकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, ऊँ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतिनां परमेष्ठि प्रजापति

र्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दासि अग्निवायुसूर्या देवताः, ऊँ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः

इसके पश्चात कम से कम 108 बार गायत्री मंत्र का जप करें


गायत्री - मन्त्र 

ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  


शक्तिमन्त्र जपकी करमाला - चित्र - संख्या के अनुसार अंक एकसे आरम्भकर दस अंक तक अँगूठे से जप करनेसे एक करमाला होती है (दे ० भा ० १११। १ ९-९ १ ९) तर्जनीका मध्य और अग्रपर्व ​​सुमेरु है।  इस प्रकार दस करमाला जप करनेसे जप - संख्या एक सौ हो जायगी, तत्पश्चात चित्र - संख्या २ के अनुसार अंक १ से आरम्भ कर अङ्क ८ तक जप करनेसे १०८ की एक माला होती है।



 जपके बादकी आठ मुद्राएँ 

सुरभिर्ज्ञानवैराग्ये योनिः शंखोङथ पंकजम् लिंगनिर्वाणमुद्राश्च जपान्तेsष्टौ प्रदर्शयेत्



सूर्य - प्रदक्षिणा 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।  

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ।।  

भगवानको जपका अर्पण - अंतर्धान भगवान्को यह वाक्यबोलते हुए जप निवेदित करे - 

अनेन गायत्रीजपकर्मणा सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायणः प्रीयतां न मम्।  

गायत्री देवीका विसर्जन - निम्नलिखित विनियोगके साथ आगे बताये गये मन्त्रसे गायत्रीदेवीका विसर्जन करे

विनियोग - '

उत्तमे शिखरे' इत्यस्य वामदेव ऋषिरुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।  

गायत्रीके विसर्जनका मन्त्र 

ऊँ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनी।  ब्राह्मणेभ्योऽभ्यानुज्ञाता गच्छ देवि!  यथासुखम्।







विष्णु पुराण द्वितीय अध्याय

दूसरा अध्याय  चौबीस तत्वोंके विचारके साथ जगतके उत्पत्ति क्रमका वर्णन और विष्णुको महिमा श्रीपराशर उवाच  अविकाराय शुद्धाय नित्याय ...