रविवार, 30 अगस्त 2020

यज्ञोपवीत

  





यज्ञोपवीत - धारण करनेकी आवश्यकता 


उपनयनके समय पिता और आचार्यद्वारा त्रैवर्णिक वटुओं को जो यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है, ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ - तीनों आश्रमों में उसे अनिवार्यतः अखण्डरूप में धारण किये रहने का शास्त्रोंका आदेश है।  किंतु धारण किया हुआ यज्ञोपवीत अवस्था - विशेष में बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करना पड़ता है 




यज्ञोपवीत कब बदलें ?  


१ - वामहस्ते व्यतीते तु तत् त्यक्त्वा धारयेत् नवम्।  


२ - पतितं त्रुटितं वापि ब्रह्मसूत्रं यदा भवेत्।  


     नूतनं धारयेद्विप्र: स्नात्वा संकल्पपूर्वकम् ।।  


३ - मलमूत्रे त्यजेद् विप्रो विस्मृतैवोपवितधृक्।  


     उपवीतं तदुत्सृज्य दध्यादन्यन्नवं तदा ।।  


     (आचारेन्दु, पृष्ठभूमि। २४५) 


४ - चितिकाष्ठं चितेर्धूमं चण्डालं च रजस्वलाम्।


     शवं च सूतिकां स्पृष्ट्वा सचैलो जलमाविशेत् 


     त्यजेत् वस्त्रं च सूत्रं च


     (आचारेन्दु, पृष्ठभूमि। २४५ में अभिलायन) 


५ - यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि।


     तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावे तदिष्यते।  


     (विश्वामित्र) 


६ - उपवीतं वटोरेकं द्वे तथेतरयो: स्मृते।  (देवल)




यदि यज्ञोपवीत कंधेसे सरककर बायें हाथके नीचे आ जाय, गिर जाय कोई धागा टूट जाय, शौच आदिके समय कान पर डालना भूल जाय और अस्पृश्य से स्पर्श हो जाय तो नये यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये।  गृहस्थ और वानप्रस्थ - आश्रम वाले को दो यज्ञोपवीत पहनना आवश्यक है।  ब्रह्मचारी एक जनेऊ पहन सकता है।  चादर और गमछेके लिए एक यज्ञोपवीत और धारण करे।  




१  धारणाद् ब्रह्मसूत्रस्य गते मासचतुष्टये।  


    त्यक्त्वा तान्यपि जीर्णानि नवान्यन्यानि धारयेत् ।।  


    (गोभिल आचारभूषण, पृष्ठभूमि। ५५)


२ - उपाकर्मणि चोत्सर्गे सूतकद्वितये तथा।  


    श्राद्धकर्मणि यज्ञादौ शशिसूर्येऽपि च ।।


    नवयज्ञोपवीतानि धृत्वा जीर्णानि च त्यजेत् ।।


    (ज्योतिषार्णव) 


३.अाकटेस्तत्प्रमाणं स्यात्।  


४ - ओंकाराग्नी तथा सर्पान् सोमपितृप्रजापतीन्।  


    वायुं सूर्यं च विश्वांश्च देवान् नवसु तन्तुषुु।  


५ - यदि श्रावणी - पूजनमें यज्ञोपवीतको अभिमन्त्रित कर लिया गया तो पुनः संस्कारकी आवश्यकता नहीं है, केवल धारण - विधिसे धारण कर लेना चाहिए।


चार महीने बीत गए नया यज्ञोपवीत पहन ले।  इसी तरह उपाकर्म में, जननाशौच और मरणाशौच में, श्राद्धमें, यज्ञ आदिमें, चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहणकेे उपरान्त भी नये यज्ञोपवीतोंका धारण करना अपेक्षित है।  यज्ञोपवीत कमरतक रहे।  




जैसे पत्थर ही भगवान् नहीं होता, प्रत्युत मन्त्रोंसे भगवान् को उसमें प्रतिष्ठित किया जाता है, उसी प्रकार यज्ञोपवीत धागा मात्र नहीं होता है।  प्रत्युत निर्माणके समयसे ही यज्ञोपवीतमें संस्कारोंका आधान होने लगता है।  बन जाने पर इसके ग्रन्थियों में और नवों तन्तुओं में ओंकार, अग्नि आदि भिन्न भिन्न देवताओं के आवाहन आदि कर्म होते हैं।  लोग सुविधाके लिये एक वर्षके लिये श्रावणीमें यज्ञोपवीतको अभिमन्त्रित कर रख लेते हैं और आवश्यकता पड़नेपर धारण विधिसे इसे पहन लेते हैं।  यदि श्रावणीका यज्ञोपवीत न हो तो निम्नलिखित विधिसे उसे संस्कृत कर ले।  




यज्ञोपवीत - संस्कार एवं धारणकी विधि 


यज्ञोपवीतमें भगवानके आवाहनकी विधि - 


यज्ञोपवीतको पलाश आदिके पत्ते पर रख कर जलसे प्रक्षालित करे, फिर निम्नलिखित एक - एक मन्त्र पढ़ कर चावल या एक - एक फूलको यज्ञोपवीतपर छोड़ता जाय।




प्रथमतन्तौ ऊँ ओंकारमावाहयामि।  द्वितीयतन्तौ ऊँ अग्निमावाहयामि।  तृतीयतन्तौ ऊँ सर्पनावाहयामि।  चतुर्थतन्तौ ॐ सोममावाहयामि।  पञ्चमतन्तौ ऊँ पितृनावाहयामि।  षष्ठतन्तौ ऊँ प्रजापतिमावाहयामि।  सप्तमतन्तौ ऊँ अनिलमावाहयामि।  अष्टमतन्तौ ऊँ सूर्यमावाहयामि।  नवमतन्तौ ऊँ विश्वान् देवनावाहयामि।  प्रथमग्रन्थौ ऊँ ब्रह्मणे नमः, ब्रह्माणमावाहयामि ।  द्वितीयग्रन्थौ ऊँ विष्णवे नमः, विष्णुमावाहयामि।  तृतीयग्रन्थौ ऊँ रुद्राय नमः, रुद्रमावाहयामि।  


इसके बाद 'प्रणवाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:' - इस मन्त्रसे 'यथास्थानं न्यसामि' कहकर उन - उन तन्तुअोंमें न्यास कर चन्दन आदिसे पूजन करें।  फिर जनेऊको दस बार गायत्री मंत्रसे अभिमन्त्रित करे। 


 यज्ञोपवीत - धारण - विधि - 


इसके बाद नूतन यज्ञोपवीत धारणका संकल्पकर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर जल गिरायें।  फिर मन्त्र पढ़कर एक जनेऊ पहने, इसके बाद आचमन करे।  फिर दूसरा यज्ञोपवीत धारण करे।  एक - एक कर यज्ञोपवीत पहनना चाहिए। 




 १ यज्ञोपवीतमेकैकं प्रतिमन्त्रेण धारयेत्।  


आचम्य प्रतिसकल्पं धारयेन्मनुरब्रवीत् ।। 


 (पराशर, आचारभूषण, पृष्ठभूमि। ५४) 




 विनियोग - ऊँ यज्ञोपवीमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषिः, लिङ्गोक्ता देवताः, त्रिस्टुप् छन्दः, यज्ञोपवीतधारणे विनियोगः।  




निम्नलिखित मन्त्रसे जनेऊ पहने 


ऊँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् ।  आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।  


ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।  




२ मन्त्रेण धारणं कार्य मन्त्रेण च विसर्जनम्। 


 कर्तव्यं च सदा सद्धिर्नात्र कार्या विचारणा ।।


 (मनु)




जीर्ण यज्ञोपवीत का त्याग - इसके बाद मन्त्र पढ़कर 'पुराने जनेऊको कण्ठी - जैसा बनाकर सिरपरसे पीठ की ओर 


निकालकर उसे जलमें प्रवाहित कर दे 


एतावद्दीनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।  


जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम् 


इसके बाद यथाशक्ति गायत्री मन्त्रका जप करे और आगेका वाक्य बोलकर भगवान्  अर्पित कर दें 


ऊँ तत्सत् श्रीब्राह्मार्पणमस्तु।  फिर हाथ जोड़कर भगवान् का स्मरण करे।




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