संध्या - प्रकरण
संध्या वन्दन करना हर मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है आइये जाने
संध्याका समय -
१ उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततरका।
अधमा सुरसहिता प्रात: संध्या त्रिधा स्मृता ।।
(धर्मार, विश्वामित्रस्म -१.२२, देवीभा ० ११, १६॥ ४)
सूर्योदयसे पूर्व जब उस आकाशमें तारे भरे हुए हों, उस समयकी संध्या उत्तम मानी गयी है। तारोंके छिपनेसे सूर्योदयतक मध्यम और सूर्योदयके बादकी संध्या अधम होती है।
२ - उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमा लुप्तसूर्यका।
अधम तारकोपेता सायं संध्या त्रिधा स्मृता ।।
(धर्मार, विश्वामित्रस्म १.२४)
सायंकालकी संध्या सूर्यके रहते कर ली जाय तो उत्तम, सूर्यास्तके बाद और तारों के निकलनेके पूर्व मध्यम और तारा निकलनेके बाद अधम मानी गयी है।
संध्याकी आवश्यकता
नियमपूर्वक जो लोग प्रतिदिन संध्या करते हैं, वे पापरहित होकर सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं
संध्यामुपासते ये तू सततं संशितव्रताः।
विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम्
(अत्रि)
इस पृथ्वीपर जितने भी स्वकर्मरहित द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)) हैं, उन्हें पवित्र करनेके लिए ब्रह्माने संध्याकी उत्पत्ति की है। रात या दिन जो भी अज्ञानवश विकर्म हो, वे त्रिकाल - संध्या करनेसे नष्ट हो जाते हैं
यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः।
तेषां वै पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयम्भुवा ।।
निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत्। त्रैकाल्यसंध्याकरणात् तत्सर्वं विप्रणश्यति।
(याज्ञवल्क्यस्मृ० प्रयश्चिताध्याय ३०७)
संध्या न करनेसे दोष
जिसने संध्याका ज्ञान नहीं किया, जिसने संध्याकी उपासना नहीं की, वह (द्विज) जीवित रहते शूद्र - सम रहता है और मृत्युके पश्चात कुत्ते आदि की योनिको प्राप्त करता है
संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजयते
(दे भा ११। १६।७।)
ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य आदि संध्या नहीं करें, तो वे अपवित्र हैं और उन्हें किसी पुण्यकर्मके करनेका फल प्राप्त नहीं होता।
संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।
यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्
(दक्षस्मृ० २.२७)
संध्या - कालकी व्याख्या
सूर्य और तारोंसे रहित दिन - रातकी संधिको तत्त्वदर्शी मुनियोंने संध्याकाल माना है
अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता।
सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।।
(आचारभूषण ८९)
संध्यास्तुति
ब्राह्मणरूपी वृक्षका मूल संध्या है, चारों वेद चार शाखाएँ हैं, धर्म और कर्म पत्ते हैं। अतः मूलकी रक्षा यत्नसे चाहिए। मूलके छिन्न हो जाने पर वृक्ष और शाखा कुछ भी नहीं रह सकते हैं
विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ।।
(देवीभा -११। १६। ६)
समयपर की गयी संध्या इच्छानुसार फल देती है और बिना समयकी की गयी संध्या वन्ध्या स्त्रीके समान होती है
स्वकाले सेविता संध्या नित्यं कामदुघा भवेत्।
अकाले सेविता सा च संध्या वन्ध्या वधूरिव ।।
(मित्रकल्प)
प्रात: कालमें तारों के रहते हुए, मध्याह्नकालमें जब सूर्य आकाशके मध्यमें हों, सायंकालमें सूर्य्यस्तके पहले ही इस तरह तीन प्रकारकी संध्या करनी चाहिए
प्रात: संध्यां सनक्षत्रां मध्याह्ने मध्यभास्कराम् ।।
ससूर्यां पश्चिमां संध्यां तिस्र: संध्या उपासते।
(दे.भा.११/१६/२-३)
सायंकाल में पश्चिम की तरफ मुख करके जब तक तारों का उदय न हो और प्रातःकाल में पूर्व की ओर मुख करके जबतक सूर्य का दर्शन न हो तबतक जप करता रहे
जपन्नासीत सावित्रीम्प्रत्यगातारकोदयात //
संध्या प्राक् प्रातरेवं हि तिष्ठेदासूर्यदर्शनात्।
(या स्मृ २.२४-२५)
गृहस्थ और ब्रह्मचारी गायत्रीके आदिमें 'ऊँ' का उच्चारण करके जप करें, और अंत में 'ऊँ' का उच्चारण न करें, क्योंकि ऐसा करनेसे सिद्धि नहीं होती है
गृहस्थो ब्रह्मचारी च प्रणवाद्यामिमां जपेत्।
अन्ते यः प्रणवं कुर्यान्नासौ सिद्धिमवाप्नुयात् ।।
(याज्ञवल्क्य स्मृ ०, आचाराध्याय २४-२५ बालम्भट्टी)
जपके आदिमें चौंसठ कलायुक्त विद्याओं और सम्पूर्ण ऐश्वर्योका सिद्धिदायक 'गायत्री - हृदय' का और अन्त में 'गायत्री - कवच' का पाठ करें। (यह नित्य - संध्या में आवश्यक नहीं है, पर अगर करे तो अच्छा है)
चतुष्षष्टिकला विद्या सकलैश्वर्यसिद्धिदा।
जपारम्भे च हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ।।
घरमें संध्या - वन्दन करनेसे एक, गोस्थानमें सौ, नदी - किनारे लाख तथा शिवके समीपमें अनन्त गुना फल होता है
गृहेषु तत्समा संध्या गोष्ठे शतगुणा स्मृता।
नद्यां शतगुणा प्रोक्ता अनन्ता शिवसंनिधौ
(लघुशातातपस्मृ ० ११४)
पैर धोनेसे, पीनेसे और संध्या करनेसे बचा हुआ जल श्वानके मूत्रके तुल्य हो जाता है, उसे पीनेपर चान्द्रायण - व्रत करनेसे मनुष्य पवित्र होता है। इसलिये बचे हुए जलको फेंक दे
पादशेषं पीतशेषं संध्याशेषं चवैव च।
शुनो मूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चेरेत् //

Very informative
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